Tuesday, 27 December 2022

बेहाल

 मचा हर दिल में बवाल सा क्यूँ है

लगता हर शख्स बेहाल सा क्यूँ है


 दुख तनाव है सबकी जिंदगी में

जीना हुआ सबका मुहाल सा क्यूँ है


सबको लगते है खुदगर्ज दूसरे लोग

खुद को समझता खुशहाल सा क्यूँ है 


चल पड़े है अनजान सी डगर पर

हर शख्स दूसरे से बेख्याल सा क्यूँ है


कैसे कटेंगी रातें इन सर्द जाड़ों में

सबके जेहन में रहता सवाल सा क्यूँ है








Wednesday, 21 December 2022

अहा शीत

                       अहा शीत 

अहा मुझे बहुत भाती  प्यारी ऋतु शीत

गाजर का हलवा गोंद के लड्डू मेरे मीत


 पहन स्वेटर दुबके रहो रजाई में 

मस्त सपनों और नींद से गाढ़ी होती प्रीत


मूंगफली गज्जक रेवड़ी मन भर खाओ

अंधेरा देख भागते दोस्त मन होता भयभीत


भूख और पौष्टिकता में बना रहता मेल 

जब बाजरे की रोटी साग संग मिले नवनीत


बर्फ गिरे पहाड़ों में  यहाँ धुंध छा जाती है

कोहरे से लिपटा दिन फुर्र से जाता है बीत


अब मोबाईल टीवी से चिपके रहते बच्चे

ना मौसम का मजा लेते ना गाए इसके गीत 


             









Wednesday, 14 December 2022

रिश्तों से परे

 


           रिश्तों से परे 

रिश्तों से परे कुछ ऐसे  रिश्ते होते हैं 

बहुत प्यारे से कुछ फरिश्ते होते है 


दुख सुख में साथ निभा जाते हैं 

जिनसे मिलने को तरसते होते हैं 


दिल की  हर बात समझ जाते हैं 

मिलने पर बस नैन बरसते होते हैं 


सीखा देते हैं उड़ना खुले आसमाँ में 

हर दिन नए अरमान जगाते होते हैं 


मिलों दूर पर दिल के करीब होते हैं 

हर दम मिलने की आस जताते होते हैं 


  दुआ  के लिए जिसकी हाथ उठे होते हैं 

नीलम  के दिल मे जज्बात पिरोते होते हैं 


रिश्तों से परे कुछ ऐसे  रिश्ते होते हैं 

बहुत प्यारे से  कुछ फरिश्ते होते है


      

Sunday, 27 November 2022

और भी मुश्किल

 तुझ संग बिताए पल भुलाना है मुश्किल

बिताए पलों को बताना और भी मुश्किल


तुमसे किया है इश्क ये जता भी ना सके

जुदा होकर तुमसे छुपाना और भी मुश्किल


किस्से तो सुनते रहे  सब तेरे मेरे प्यार के

गहरे प्यार को समझाना रहा और भी मुश्किल


एक दूसरे के गम दुख सांझा करते रहे हरदम

खुशियों में जुदा होना कर गया और भी मुश्किल


तेरे साथ रहते हुए भी दूर तो बहुत थी तुझसे

जुदा होकर जीना कर गया और भी मुश्किल




Saturday, 19 November 2022

कारवाँ बना

 


                कारवाँ बना

उग आये हैं रास्ते में जंगल तो क्या
बढ़ पगडंडी पर अपना नया रास्ता बना

तेरे दिखाए रास्ते पर चलें दूसरे
आगे बढ़ और एक नई मिसाल बना

तेरी राह रोशन करे राह दूसरे की
ना बुझने वाला ऐसा कोई दीपक जला

राह में रोड़े मिलेंगे बिखरे हुए
उन्हीं को चुनकर अपना रास्ता सज़ा

चल निकला है जो नए रास्ते पर
आने वाली अड़चनों को अपनी ताकत बना

जग में नाम उनका ही रहा है रोशन
चले अकेले जो दुखों को साथी बना

देखना पूरे हो जाएंगे सपने एक दिन
चल अकेला और पीछे लोगों का कारवां बना 

Friday, 4 November 2022

कतरा कतरा

 


        कतरा कतरा

कतरा कतरा कटती रही

बूंद बूंद बहती रही

दुखों में बरफ सी जमती रही

खुशी में फूल सी खिलती रही

सुखों में धूप सी पिघलती रही

दिल में धड़कती रही 

रगों में खून सी बहती रही

कंकड़ सी  पांव में चुभती रही

पल पल भटकती रही

कभी उदासियों में घिरती रही

कभी कलियों सी महकती रही 

कभी चिड़िया सी चहकती रही 

किसी नशे सी झुमती रही 

अल्हड़ सबां सी बहकती रही 

नदीया की धार सी चलती रही 

रेत की मानिंद फिसलती रही

शोख रंग सी चटकती रही

धीमे धीमे सरकती रही

गमों में सुबकती रही

बचपन से जवानी तक

जवानी से बुढ़ापे तक

जिंदगी यूँ ही गुजरती रही

   नीलम नारंग



Friday, 28 October 2022

दोहरा वजूद

 


         दोहरा वजूद
दोहरे वजूद को जीती रही
हर बार अपने ही लब सीती रही
मुझे ललकारता मेरा ही मौन
अकसर प्रश्न उछालता मै कौन
हिरणी सी यहाँ वहाँ भागती रही
पता नहीं क्या तलाशती रही
उम्र गुजरती रही
बेचैनी बढ़ती रही
आखिर एक दिन छिड़ी मन से मन की जंग
जिसे सुन मै भी रह गई दंग
फिर खुद के लिए  बनाईं एक सीमा रेखा
कुछ भी हो जाए खुद को नहीं करना अनदेखा
मेरी भी अपनी एक जिंदगी है
करनी उसकी भी बन्दगी है
जीना है मुझे और आगे बढ़ना है
अपनी हस्तरेखा को खुद ही गढ़ना है
इस सोच से ही स्फूर्ति छा  गई
और जिंदगी मेरी मेरे करीब आ गई
     




Wednesday, 26 October 2022

जीने का बहाना

        जीने का बहाना


जाते हुए जीने का बहाना दे गया
दोस्त अपना  प्यारा पुराना दे गया

राज़दार  रहा था जो हम दोनों का
दोस्ती का  वो भरपूर खजाना दे गया

नहीं तो बहते ही रहते आँख से आँसू
लबों पर हँसी का ऐसा  बहाना दे गया

जात पात से ऊपर ही रखना दोस्ती को
लोगों को परखने का अलग पैमाना दे गया

वैसे ही किस्सों में  चल रही थी जिन्दगी
एक नई कहानी नया अफ़साना दे गया

बहुत  से अनमोल तोहफे दिए तुमने
दोस्ती के नाम पर ये कैसा नज़राना दे गया

भूलकर मुझे नई दुनिया बसा लि तुमने तो
जाते हुए मुझे रहने का ठिकाना दे गया 

Saturday, 22 October 2022

बादल

 


किसीकी याद को तरस रहे हैं

जो यूँ  ही बेतहाशा बरस रहे हैं


तेरे आने से मिले सुकून के लम्हे

तेरे बिन जाने कैसे झुलस रहे हैं


घुल जाती है कुछ कड़वाहट कभी

खुद को चाहे रखे कैसे सरस रहे हैं


महका रही है मिट्टी की सौधीं खुश्बू

इसके बिन तो जीवन नीरस रहे हैं


इस भीगे मौसम में आ जाओ साजन

अब तो लगता दुर्लभ तेरे दरस रहे हैं

          



Friday, 21 October 2022

ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ

 ਸਲਾਮ ਕਰ ਦੀ ਹਾਂ ਮੈ

ਪੰਜਾਬ ਦੀ ੳਸ ਮਾਂ ਭੈਣ ਤੇ ਧੀ ਨੂ
ਜਿਸ ਮਾਂ ਨੇ ਜਮਆ ਸੂਰਮਾ ਪੂਤ
ਜਿਨੂ ਘੋੜੀ ਚਢਾਣ ਦੇ ਖਾਬ ਦੇਖੇ
ਛੱਡ ਘੋੜੀ ਔ ਚਢ ਗਿਆ ਫ਼ਾਂਸੀ
ਨਾਲ ਕਸਮ ਦੇ ਗਿਆ ਹੰਝੂ ਨਾ ਵਹਾਇ
ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ ਹੈ ਸਿਰ ਨੀਵਾਂ ਨਾ ਪਾਈ
ਸੌਚ ਰਹੀ ਮਾਂ ਨਿਮਾਨੀ
ਹੰਝੂ ਜਥਰ ਕਿਵੇਂ ਕਰਾ
ਮਾਂ ਤਾਂ ਮਾਂ ਹੁੰਦੀ ਹੈ
ਏ ਦੁਖੜਾ ਮਾਂ ਕਿਵੇਂ ਜਰੇ
ਦਸੇ ਤਾਂ ਕਿਨੂ ਕਿ ਕਹੇ
ਹੁਣ ਵੀ ਮਾਂਵਾਂ ਪੂਤ ਤਾਂ ਮੰਗਦਿਆਂ ਨੇ
ਡਗਤ ਸਿੰਘ ਸਰੀਖੇ
ਪਰ ਅਪਨੀ ਕੂਖ ਤੌ ਨਹੀਂ
ਦੂਜੇ ਦੀ ਕੂਖ ਤੌ ਜਮਾਈ
ਔ ਬੌਗੇ ਨੂੰ ਬੇਬੇ ਬਨਾ ਗਿਆ
ਆਵਦੇ ਜਨੀ ਭੇਦ ਸਾਰੇ ਮਿਟਾ ਗਿਆ
ਕਿ ਔਸ ਡੈਣ ਦੀ ਗੱਲ ਸੂਨਾਵਾਂ
ਰੱਖੜੀ ਦਾ ਮੂਲ ਚੱਕਾ ਗਿਆ
ਉਸਦੀ ਰਖਿਆ ਕਰਨ ਵਾਸਤੇ
ਲੜ ਬੈਠਾ ਕਿਨੇ  ਹੀ ਆਤਤਾਇਯਾਂ ਨਾਲ
ਸਲਾਹੁਦੀ ਨ੍ਹੀ ਥੱਕਦੀ ੳਸ ਧੀ ਨੂ
ਕਾਟਤੀ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ੳਦੇਂ ਨਾਮ ਤੇ
ਜਿਹਦੇ ਲਾੜ ਨਾਲ ਲਾਣ ਦਾ ਪਿਓ ਨੇ
ਕੀਤਾ ਸੀ ਵਿਚਾਰ ਕਦੇ
ਕਿਨਾ ਫਰਕ ਹੈ ੳਸ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਤੇ ਆਜ ਦਿ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਆਜ ਦਾ ਨੌਜਵਾਨ ਜਿਨ੍ਹੇ ਅਪਣੇ ਆਪ ਨੂ
ਗੁਲਾਮ ਬਣਾ ਲਿਆ ਹੈ ਨਸ਼ੇਆ ਦਾ
ਕਿਵੇਂ ਸਮਝ ਸਕੇਗਾ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂ











Wednesday, 19 October 2022

असर ऐसा

 तेरी चाहतों का रहा कुछ असर ऐसा

तेज हवाएँ ढहा जाए कुछ कहर जैसा


साथ साथ समानांतर चलते रहे

 अब आ गया जिंदगी में सहर कैसा


 सिर्फ तुम्हें बनाया था राजदार अपना 

राज खोल दिया तो रहा हमसफ़र कैसा  


बच कर रह रही हूँ सबकी निगाहों से

घोल दिया मेरी जिंदगी में ये जहर कैसा


आग लगी झुलस गया तन मन सब 

जैसे जले बदन गरमी की दोपहर जैसा


मार के पत्थर खलबली सी मचा दी 

था कभी शांत खामोश सी नहर जैसा






Friday, 14 October 2022

मेरा घर

            मेरा घर


सारी उम्र की कमाई को खर्च कर डाला
पाई पाई जोड़कर  मोहताज कर डाला

खून पसीना बहाकर जोड़ा था जो पैसा
उससे उम्मीदों का महल खरा कर डाला

जगह जगह से इक्कठे किए  सुन्दर फूल
पेड़ पौधे लगा घास उगा बगीचा बना डाला

सोचा था मिलेंगे जब फुर्सत के कुछ क्षण
मस्ती के पलों के लिए जुगाड़ बना डाला

जब मिली फुर्सत और बैठने का समय मिला
तब  बच्चों ने अलग अपना घरौंदा बना डाला

ऐसे समय साथी भी साथ छोड़ चल बसा
निराशा छा गयी विक्षिप्त सा जीवन बना डाला

महीनों बीता दिए  खुद से समझोते  करते हुए
चाय से इश्क जता खुद को आशिक बना डाला

अब मैं हूँ मेरा इश्क है और मेरी तन्हाई है
मोबाइल ले हाथ में खुद से प्यार कर डाला
               
                       


Thursday, 6 October 2022

किताबें

 खामोश सी बंद दिखने वाली किताबें 

 खोलने पर बहुत ज्यादा बोलती हैं 

लिखने वाले के दिल में दफन 

अनछुए पहलुओं के 

बरसों से  अबोले राज खोलती हैं

इनकी भी अलग  दुनिया है अपनी

दिखाकर जादूगरी शब्दों की 

पढ़ने वाले की नब्ज टटोलती हैं

 गलतियां गलतफहमियां है क्या 

क्यूँ दरारें पड़ जाती हैं दिलों में 

 ये आँखो पर पड़े पट खोलती हैं

होंसला देती हैं  जागती आँखों को 

नित नए सपनों को साकार करने का 

रवानगी दे  खुला आसमान खोजती हैं 

कुछ ऐसे मीठे से शब्द परोसकर 

कानों में शहद सा मीठा रस  घोलती हैं 

बात से बात जुड़ जुड़ कर 

बन जाती एक कहानी है 

जो पढ़ने वाले के आसपास डोलती है 

खामोश सी बंद दिखने वाली किताबें 

 खोलने पर बहुत ज्यादा बोलती हैं

Thursday, 29 September 2022

इस जिंदगानी में

 दुख बहुत मिले  इस जिंदगानी में

देख इन गमों को बल पड़े पेशानी में


 कभी ढूँढनी चाही ही नहीं खुशियाँ

बस  हरदम घूमते   रहे परेशानी में


जिंदगी को लेकर बुने थे जो ख्वाब

बुलबुले की भांति बह गए पानी में


टूटा हुआ दिल लिए फिरते रहे यूँ ही

रो कर ही काट लिये दिन जवानी में


फिर एक दिन सोचा खुद के बारे में

आ गया उस दिन एक मोड़ कहानी में


जीने लगी अब एक नई सी दुनिया में

जिंदगी चलने लगी फिर से रवानी में


छोड़ सब गम खुद को दी  नई मुस्कान

छोड़ कर दिया खुद को हवा सुहानी में

 

अब समझ आया वो जिंदगी ही क्या

हंसते हंसते जो कट जाए आसानी में

              

                   

          

Saturday, 24 September 2022

ਬਚਪਨ

 ਅਜਿਹੇ ਵੀ ਕੁਝ ਵੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

ਜਗ ਤੋਂ ਪਿਆਰੇ ਜਿਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 


        ਅੱਜ ਵੀ ਉਸਦੀ ਯਾਦ  ਆਂਦੀ ਹੈ

      ਖਿੜਖਿੜ ਹੱਸਣ ਦੀ ਆਵਾਜ ਆਂਦੀ ਹੈ

       ਬੀਤ ਗਏ ਜਿਹੜੇ ਦਿਨ ਨਿਆਣਿਆਂ  ਦੇ 

     ਉਸਦੀ ਤਾਂ ਬਸ ਹੁਣ  ਯਾਦ ਰੁਆਂਦੀ ਹੈ


ਹਰ ਦਿਨ ਨਿਤ ਨਵੇ ਖੇੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

 ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਵੀ ਕੁਝ ਵੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

ਜਗ ਤੋਂ  ਪਿਆਰੇ ਜਿਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 


       ਪੜ੍ਹਨ ਦੀ ਨਾ ਕੋਈ ਬਾਤ ਹੁੰਦੀ ਸੀ

    ਦੋਸਤਾਂ ਵਿਚ ਨਾ ਕੋਈ ਜਾਤ ਹੁੰਦੀ ਸੀ

ਹਰ ਵੇਲੇ ਹੱਸਣਾ ਖੇਡਣਾ ਤੇ ਖੁਸ਼ ਰਹਿਣਾ 

ਭੱਜਦਿਆਂ ਨਸਦਿਆਂ ਹੀ ਰਾਤ ਹੁੰਦੀ ਸੀ


ਖੇਡਣ ਨੂੰ ਬਸ ਰੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ

ਇਹ ਜੇ ਵੀ ਕੁਝ ਵੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

ਜਗ ਤੋ ਪਿਆਰੇ ਜੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 


         ਜਿੱਥੇ ਬੈਠੇ  ਔਖੇ ਹੀ ਖਾ ਲੈਂਦੇ ਸੀ 

         ਜੋ ਮਿਲਿਆ ਔਹੀ ਪਾ ਲੈਂਦੇ ਸੀ

     ਤੇਰ ਮੇਰ ਦੀ ਕੋਈ ਥਾਂ ਨਹੀਂ ਸੀ 

     ਚਾਚੇ ਮਾਮੇ ਤੋਂ ਵੀ ਕੁੱਟ ਖਾਂ ਲੈਂਦੇ ਸੀ


ਸਾਰੇ ਭੈਣ ਭਰਾ ਨੇੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

ਇਹਜੇ ਵੀ ਕੁਝ ਵੇਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ 

ਜਗ ਤੋਂ ਪਿਆਰੇ ਜਿਹੜੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ

Tuesday, 20 September 2022

दिल के दीए

 

जी रहे हैं बुझा के दिल के दिए
हैं महफ़िल में दिल तन्हा लिए

क्या बताएं कि कैसे जी रहे हैं
आंसू बस पलकों ने ही है पिए

अब छोड़ दिया है दर्द में जीना
जब से छोड़ दुखों को लब सिए

डसने लगी थी दिल की तन्हाई
इसलिए महफ़िल से लगाए हि

कहने को रहती हूँ मै बहुत खुश
इसको पाने के लिए  जतन किए

तन्हा दिल और हर महफ़िल भाए
कुछ इस तरह नीलम जिंदगी जिए



Sunday, 18 September 2022

ये ख्वाब

 चुरा के आंखों से नींद रात भर जगाए

अधूरे ही रहेंगे पर ये ख्वाब मुझे भाए


चले आओ जिंदगी में कभी यूँ ही

क्यूँ ना हर लम्हा तेरे साथ ही बिताए


तन्हाई ने घर बना लिया है मेरे  दिल में

शायद गमों का बोझ ही हल्का हो जाए


जानती हूँ साथ ना निभा पाओगे उम्र भर

 कुछ कदम साथ चलने का वादा किया जाए 


दुखों ने साथ दिया है जिंदगी के हर मोड़ पर

फिर क्यूँ ना गमों को प्यार से सहलाया जाए


अधूरी  ख्वाहिशों के साथ जीना ही जिंदगी है

चलो हंसकर ही सही हसरतों को  दबाया जाए


दोस्तों की महफ़िल में मिल जाती है खुशी

नीलम हर हाल रूठे दोस्तों को मनाया जाए



Wednesday, 14 September 2022

औरत की पीड़ा

 ना में छिपी  ना को ना कब समझोगे 

बताओ मुझे इंसान कब समझोगे 


खुद पीड़ा सहकर जन्म देती हूँ जिसे 

मुझे  उससे ताकतवर कब समझोगे 


परेशानी में मेरे  ही पहलू में बैठते हो 

मुझसे कमजोर खुद को कब समझोगे 


कमाकर बनाकर खिला सकती  हूँ 

घर चलाने वाली बताओ कब समझोगे 


कमी निकालते हो मेरे कपड़ों में हरदम 

खुद की नजरों को संभालना कब समझोगे  


इज्ज़त औरत की ही क्यूँ उतरतीं है 

उतारने वाले को गुनहगार कब समझोगे 




Sunday, 11 September 2022

रिश्ते

 


           रिश्ते

कितने प्यार से पलते थे रिश्ते
सबसे प्यारे थे खून के रिश्ते

हवा चली कुछ ऐसी फिजा में
तार तार हुए सबसे प्यारे रिश्ते

छूटने लगे है अपने सगे संबंधी
हो गए जान से प्यारे बेगाने रिश्ते

खो गया प्यार मुहब्बत आपस में
पैसे से तूल गए थे जो प्यारे रिश्ते

संभाल लो वक़्त रहते इन रिश्तो को
धोखे की आँधी में उड़ न जाए रिश्ते

  दिल ना दुखाया करो माँ बाप का
दुनिया में ये दो ही हैं अनमोल फरिश्ते

बेरंग सी हो जाएगी दुनिया हमारी
जिंदगी में रंग भरेंगे ये प्यारे रिश्ते

सुख दुख कट जाएंगे आसानी से
साथ निभाने वाले होंगे प्यारे रिश्ते

सुकून से गर चाहते हो जीवन को
खुशी से थाम कर रखो प्यारे रिश्ते 

Monday, 29 August 2022

ਜਦੋਜਹਿਦ

 ਜਦੋਜਹਿਦ 


ਇਕ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਬੀਜ 

ਕਰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਜਹਿਦ 

ਮਿੱਟੀ ਚੋ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਣ ਦੀ

ਆਪਣੇ-ਆਪ ਨੁ ਪਲਵਿਤ ਕਰਨ ਲਈ 

ਕਾਰਦਾ ਹੈ ਸੰਘਰਸ਼ 

ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਵੀ ਤੇ ਮਿੱਟੀ ਨਾਲ ਵੀ 

ਹਵਾ ਪਾਣੀ ਤੇ ਪਕੂਤਿ ਨਾਲ ਵੀ

    ੲਵੇ ਹੀ ਹਰ  ਔਰਤ ਦਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਵੀ 

ਚਲਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ੳਮਰਭਰ 

ਕਰਦੀ  ਰਂਹਦੀ ਹੈ ਔਹ ਵੀ ਜਦੋਜਹਿਦ 

ਹਰ ਵੇਲੇ ਅਪਣੇ ਆਪ ਨਾਲ ਵੀ

ਘਰ ਦੇ ਥਂਦੇਯਾ ਨਾਲ ਵੀ ਤੇ ਸਮਾਜ ਨਾਲ ਵੀ

ਤਾਂ ਹੀ ਪਾ ਸਕਦੀ ਹੈ ਆਪਣਾ ਵਜੂਦ 

ਤਾਂ ਹੀ ਮਿਲਦੇ ਨੇ ਓਸਨੂ 

ਅਪਣੇ ਸਪਨੇਯਾਂ ਦੇ ਖਾਮਥ

Friday, 26 August 2022

भुगतान

 भुगतान

बीती जिंदगी के भुगतान कर रहे हैं

जिंदगी पर बस अहसान कर रहे हैं


खूबसूरत मीत यार थे जो बचपन के

दे धोखा  खुद को अनजान कर रहे हैं


बन शातिर तमाशाई खड़े हैं  भीड़ में

लगा आज उससे नई पहचान कर रहे हैं

Wednesday, 24 August 2022

रुकना नहीं

 रुकना नहीं

चलते हुए  अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

       तलाश कर रही  थी

       जिस मंजिल की बरसों से

        आने वाली है बस वो

ठहर जरा पर थकना नहीं

चलते हुए अब  रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

                हैं रास्ते टेढ़े तो क्या

             थकने लगे हैं पांव तो क्या

              धूप की तपन है तो क्या

कुछ भी हो पीछे  हटना नहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

           राह में मिलेंगे खार भी

           तेज धूप रेत जैसे थार की

         मन में ना आने पाए हार की

मजबूत रख इरादे डटना वहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

               हरदम है एक नया संघर्ष

               मन में उठे नया जोश सहर्ष

             नहीं सोचना करम का निष्कर्ष

हालात कैसे भी हो टूटना नहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

Friday, 19 August 2022

वाह

 बस एक  वाह क्या निकली उनके लिए

उम्र भर के लिए वो तो फिदा हो गया

चाहत अभी लत में बदलने ही लगी थी

हसीन सपने सा वो मुझसे जुदा हो गया

Monday, 15 August 2022

सावन

 


           सावन

हर सावन कुछ इस तरह आए
कोई मुस्कुराए कोई नीर बहाए

कोई  बैठ बगीचे  में पकौड़े खाए
कोई रोटी को भी तरसता जाए

बारिश की बूँद कहीं मन बहलाए
यही बूँद  किसी की छत टपकाए

किसी को सावन सब हरा दिखाए
कोई  रोज की रोटी रोजी से जाए

पानी में कागज की नाव बनाए
बच्चों को यह मयस्सर हो जाए

खुशियों भरे दिन यहाँ सब बिताएं
नीलम करे सबके लिए बस यही दुआएं
                 




Thursday, 11 August 2022

गुज़र बसर

 गुजर बसर

कुछ तेरा भी हुआ है मुझपर असर

ये चेहरे पर भी आने लगा है नजर


बंद कली थी अब खिल उठी फूल सी

मुरझाया चेहरा जैसे बन गया हो टसर


घर में तो तुम्हारे कभी   बस ना पाऊंगी 

नजरों में रहकर ही कर लेंगे  गुजर बसर 


बच कर रहना इस बेरहम दुनिया में

चाहतों पर लग ना जाए किसी की नजर


खून के आंसू रूला देतें है लोग बेवजह

बेआबरू करने में नहीं छोड़ते कोई कसर


हालात हावी हो जाते हैं  कभी कभी उनपर

   वक़्त रहते वक़्त की जो करते नहीं कदर 


करती रहना हौसला आगे बढ़ने का हरदम

पीछे हटने के लिए मत करना अगर मगर


खुद को साबित करने पकड़ ली राह नई

कठिनाई से भरी है नीलम ये नई डगर

Sunday, 7 August 2022

वज़ूद

 शीर्षक :   वजूद 


कुछ  सवाल घेरे रहते हैं मुझको

जब भी कोई पूछता  है

 मुझसे  ही वजूद मेरा

हैरत में पड़ जाती  हूँ 

जब परिचय देते हुए बोलती हूँ

सिर्फ  एक  ही शब्द 

इंसान सिर्फ इंसान 

और अगला प्रश्न उछलता  है 

धर्म जात गोत्र कौन सी 

किसकी बहु बेटी हो किसकी

हर बार उलझा जाता है  ये प्रश्न मुझे

कभी कभी क्रोधित हो उठती हूँ

और कभी हँसी में टाल जाती हूँ

व्यथित हो उठती हूँ अक्सर 

इस तरह के सवालों से 

जो आंकते हैं कमतर 

हर उस औरत को 

जो ढूँढ रही है राह नई

बनाना चाहती है अस्तित्व

अपनी एक पहचान नई

पूछती हूँ मै आप सबसे 

क्या  जायज  नहीं है मेरा व्यथित होना

इन सब बातों पर

            

Thursday, 4 August 2022

कुछ पल उधार ले

 आ जिंदगी से कुछ पल उधार ले

फिर वो वक़्त साथ मेरे गुजार ले 


खो गया जो समय नासमझी में 

जी कर साथ जीवन को संवार ले


उलझ गई किसी धागे की मानिंद

सुलझा जिंदगी का एक एक तार ले


हर पल है एक नई जंग जिंदगी

कयूँ ना इसे आइने में उतार ले 


लौट  आए शायद बीता हुआ वक़्त

आओ मिलकर दिल से  पुकार ले


हसरत है अच्छा जीवन जीने की गर 

क्यों न वक़्त को वक़्त पर ही वार ले 


निकल आएगें इस तरह निराशा से

अगर  अंधेरे को उजालों से मार ले

Wednesday, 3 August 2022

दीवाने हो जाते हैं

 दीवाने हो जाते हैं

कैसे कुछ किस्से पुराने हो जाते हैं

 जब अपने लोग भी बेगाने हो जाते हैं


मची है पैसा कमाने की होड़ कुछ ऐसी 

अब अपनों से मिले ही जमाने हो जाते हैं


एक तुम्हें ही क्यों दोषी ठहराया जाए 

काम निकलने पर सब सयाने हो जाते हैं


पागल  ही होते हैं जाने क्यों कुछ लोग

पहली ही नजर में बस दीवाने हो जाते हैं


चली हैं जमाने में शक की हवाएँ इस तरह 

जरा सी बात पर खत्म अफसाने हो जाते हैं


कीमत समझते हैं जो लोग दोस्तों की 

वो उनके लिए अनमोल खज़ाने हो जाते हैं


साथ देते हैं जो बुरे वक़्त में किसी का 

जाने कब मीत वो अनजाने हो जाते हैं

Tuesday, 19 July 2022

सिला

 



                सिला

मेरी चाहतों का नहीं  सिला  मिला
जिंदगी भर सबसे ही गिला मिला

खार ही आए मेरे हिस्से में तो
कभी कोई फूल नहीं खिला मिला

सपनों के साथ उड़ना चाहा जब
रीति-रिवाज का खड़ा किला मिला

मरहम लगाती रही उम्रभर जिसपर
हर बार जख्म वही छिला मिला

नदिया की धार सी बह निकली
लाख राह में अड़ा शिला मिला

जब तराश  लिया वजूद  अपना
फिर नीलम को सारा विला मिला 

Saturday, 9 July 2022

गिले शिकवे

 गिले शिकवे

क्या दिन थे जब हम मिले थे

लगा हर जगह फूल खिले थे


बरसों रहा तेरा मेरा याराना

बरसों चले यही सिलसिले थे


याद है तुझे पाने का वो जनून

जाने कितने फतह किए किले थे 


खुश थे एक साथ रहकर हम 

चाहे एक दूसरे से बहुत गिले थे


कांटों की चुभन महसूस ना हो

खूबसूरती से ही लब सिले थे 


खार चुभ रहें हैं आज तो क्या

तेरी यादों  से ही जख्म छिले थे


धोखा दिया वक़्त ने ये कैसा

कभी तो हजारों रंग खिले थे

Monday, 4 July 2022

धड़कने लगा हूँ

 


           धड़कने लगा हूँ

तेरे सांसो की महक से महकने लगा हूँ मै
ए दिल  तू रोक ले मुझे बहकने लगा हूँ मैं

इस अंदाज से मत देख  मुझे महबूब मेरे
चाहतों की कसम तुझे चाहने लगा हूँ मैं

मुझसे दूर जाने की कोशिश करके देख ले
अब तेरे दिल में रहकर धड़कने लगा हूँ मै

राज पूछेगें सब तेरे चेहरे की मुस्कान का
तेरी परछाई बन साथ तेरे चलने लगा हूँ मै

ख्वाबों ख्यालों की जो ये दुनिया है तेरी
तेरे सपनों में साथ तेरे चहकने लगा हूँ मै

गवाही देगा पूनम का चाँद भी प्यार की
जो चौंध बन माथे तेरे चमकने लगा हूँ मै

रंग ये  तेरे बदन का बदल रहा है जो
बन ज्वाला  सी तुझमें दहकने लगा हूँ मै

नजरें गवाह है दिल में बसे इस प्यार की
काजल बन आँख में फड़कने लगा हूँ मै

आ बैठ पास मेरे आत्मसात हो जाए
नीलम कयूँ तेरे प्यार में भटकने लगा हूँ 

Tuesday, 28 June 2022

आँखे

 आँखे


कयूँ राज दिल के खोल गई आँखे

लब चुप रहे पर सब बोल गई आँखे


अश्क अभी ढलकने को ही था 

उसमें गम का वजन तोल गई आँखे


लब तो मशगूल रहे मुस्कुराने में

दर्द-ए-दिल की खोल पोल गई आँखे 


गलत नजरों ने जब देखा किसीने 

सबकी नजर में जहर सा घोल गई आँखे 


अंधेरों में जीने की आदत थी जिनको

मिली रोशनी तो बन अनमोल गई आँखे 


देखा किसी ओर को तड़पते हुए दर्द से

सीने में उठा दर्द और डोल गई आँखे 


मसला आया  इकरार और इसरार का

इश्क में बेवजह कर कलोल गई आँखे

           

Thursday, 9 June 2022

किस्से वफा के

 वफा के किस्से सुनाने  लगी हूँ

खुद को ही आजमाने लगी हूँ


मोहब्बत  है अपनी तन्हाई से

प्यार के तराने गुनगुनाने लगी हूँ


गम नहीं साथ छोड़ने का ना जुदाई का 

खुद की पहचान बनाने लगी हूँ


खुद को देने सुकून के कुछ पल 

बैठ दरिया किनारे पैर भिगोने लगी हूँ


अतीत की परछाईयाँ ना आड़े आए

अपने गम भी इसमें बहाने लगी हूँ


मन में जमी मैल को हटाने लगी हूँ

खुद को प्यार से समझाने लगी हूँ


दिल के जख्म भर जाए जल्द ही

प्यार से खुद को सहलाने लगी हूँ

Saturday, 4 June 2022

कुछ लम्हें

 आए थे तुम जिंदगी में 

लिए सुकून के कुछ लम्हे

इन थोड़े से लम्हों को जीकर 

लगा जिंदगी छोटी नहीं है

जी उठे फिर से प्यार तेरा पाकर 

उधड़े से रिश्तों को सीकर 

थाम लिया दामन खुशियों का

जैसे कोई भौरां नाचे फूल पर 

फूलों का ही रस पीकर






Tuesday, 17 May 2022

कुछ ख्वाहिशे

                              कुछ ख्वाहिशे


जब भी  निहारती हूँ आसमाँ को
बन उन्मुक्त पंछी  गगन को  छूना चाहती हूँ
घिर आए काले बादलों को देख
बन पानी की बूंद उसमें समाना  चाहती हूँ
एकसार बहते समुद्र को देख
पानी की बूंद सा गिर सीप बन जाना चाहती हूँ
अनजान सी राहों पर चलकर
अपने पैरों के निशान छोड़ना चाहती हूँ
औरत मर्द के भेदभाव को मिटा
इंसानियत से इंसान की पहचान चाहती हूँ
रात के अंधेरे में कहीं भी बैठ
कुछ देर  दिल खोलकर हँसना चाहती हूँ
मुरझाए हुए दागदार चेहरे को
घंटो दर्पण में खुद को निहारना चाहती हूँ
लाख कमियाँ होगी मुझमें
उनसे इतर खुद को तराशना  चाहती हूँ
पकड़ ली है नई पगडंडी मैनें
सब कुछ छोड़कर खुद को तलाशना चाहती हूँ
असमंजस सी में है नीलम
पूछती हूँ खुद से क्या कुछ गलत तो नही चाहती हूँ


Monday, 9 May 2022

बात करते है

 


            बात करते है

बैठ मेरे पास कुछ राज की बात करते है
ए जिन्दगी तेरे मिजाज की बात करते है

ढूँढनी  चाही  थी जब महक फूलों की
मिले जो खार उसकी ही बात करते है

चलना चाहा जब जाने पहचाने रास्ते पर
तेरी दिखाई अनजान डगर की बात करते है

माना रास्ता लम्बा था संघर्ष से भरा हुआ
चल छोड़ खुशी से मंजिल की बात करते है

राह में कौन मिला बिछड़ा जाने दो सब
जिसने साथ निभाया उसकी बात करते है

किसने हँसी उड़ाई किसने जख्म दिए
चल मरहम लगाने वाले की बात करते है

कयूँ रखे आँख से निकले आँसू का हिसाब
लब पर बिखरी मुस्कान की बात करते है

कुछ हसरते तो सबकी अधूरी रहती है
हम तो जो पुरी हुई उनकी बात करते है

रोने वाले को ही  ओर भी रुलाती है
ये दुनिया जिसकी हम सब बात करते है

चलो भूल जाते है अतीत के दिए दर्द को
बस आज के सुख की नीलम बात करते है
                    

Wednesday, 27 April 2022

शिद्दत

 मेरे सीने में उठा दर्द तेरे चेहरे पर उभर आया

चाहत की शिद्दत से फिर जता भी नही पाया
अब लोग मुझसे तेरे गम की बात पूछते है
तेरी रूसवाई के डर से बता भी नही पाया

Wednesday, 20 April 2022

शब्द

                शब्द

शब्दों की भी अपनी अलग शान है
कहने को लगते निर्जीव से  है
पर शब्दों में  बड़ी जान है
कई शब्द होते है  ऐसे 
जिनमें समाया सारा जहान है
जादू से होते है कुछ शब्द
दुखी चेहरे की बनते मुस्कान है
कुछ करके अलग शब्दों का इस्तेमाल
समाज में बनाते अलग अपनी  पहचान है
कुछ शब्द होते है ऊर्जावान
जगा देते दबे हुए अरमान है
कुछ शब्दों में छिपी होती है प्रेरणा
वो देते सपनों को नई उड़ान है
शब्द ही बिठाते तख्तो ताज पर
कभी दिलाते कफन का सामान है
मिश्री सी घोलते हैं कभी कान में
कभी बजाते ना भूलने वाली तान है
शब्दों का चयन कैसे करना है
अब तो सिखाने के लिए खुल गए संस्थान है
सोच समझ कर बोला करो यारो
इन्हीं से जग में बनती हमारी पहचान है
शब्द चाहे तोड़ दो दिल ना किसी का तोड़ो
टूटे दिल को जोड़ना फिर नहीं आसान है
शब्द टूटकर नए अर्थ में बदल जाते है
नए अर्थ से रचते इतिहास  महान है
        






Monday, 11 April 2022

महिला अधिकार और दुरुपयोग

 


                                          महिला अधिकार और दुरुपयोग

                                    यह सच है कि महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए भी लम्बा संघर्ष करना पड़ा है । हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005  के अनुसार पैतृक सम्पति में बेटियों को बराबर का अधिकार  है  । यह उनका संवैधानिक अधिकार तो है परन्तु सामाजिक तौर पर कितनी ऐसी महिलाएँ हैं जो अपने भाईयों से बराबर का हिस्सा ले सकती हैं या मांग सकती हैं और जो मांगती हैं वह मायके की तरफ से बहिष्कृत हो जाती हैं । बहुत सी औरतें घर में अभाव होते हुए भी अपनी पैतृक सम्पति में सिर्फ इसलिए हिस्सा नहीं माँगती कि कहीं भाई नाराज न हो जाए।  जागरूकता के अभाव में या अनपढ़ता के कारण भी  बहुत सी महिलाएँ अपने अधिकारों को ना जान पाती है ना समझ पाती है और उनके लिए अपने अधिकार की लड़ाई  तो बहुत दूर की कौड़ी होती है ।
                                  दूसरी तरफ कुछ ऐसी महिलाएँ  भी हैं जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं ,  ज्यादा पढ़ी लिखी हैं , समझदार हैं और समाज में व्याप्त असमानता को मिटाना अपना सामाजिक दायित्व समझती हैं । ऐसी महिलाएँ अपना सामाजिक दायित्व बखूबी निभा रही हैं ,फिर भी इनके काम को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही हैं । हालाँकि ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है ।  ये महिलाएँ ऐसी जगहों पर काम कर रही है जहाँ गरीबी है ,अनपढ़ता है । जहाँ औरतों को अपना और अपने बच्चों का पेट भरना है और उसके लिए दिन रात काम करना है ।  उन्हें ना ही अपने अधिकारों का ज्ञान है ना ही जानने की फुर्सत ।  ऐसी महिलाएँ जल्दी से किसी की बात सुनती भी नहीं और समझ भी नहीं पाती । 

                                तीसरी तरफ ऐसी महिलाएँ  भी हैं जो बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं है निश्चित रूप से ही अति महत्वाकांक्षी जरूर है । जिन्होनें अपने अधिकारों की जानकारी  प्राप्त कर ली है और इन्हें ही हथियार बनाकर और इसकी आड़ लेकर समाज की सहिष्णुता को नुकसान पहुंचा रही हैं  ।  उन्हें अपने अधिकारों के सदुपयोग से कम मतलब है वो तो इसकी आड़ लेकर पुरूषों को तुच्छ साबित करना चाहती हैं । वे येन प्रकारेण अपने मकसद को पाना चाह  रही हैं । उनके साथ किसी प्रकार का शोषण नही होता । वे पुरूषों पर यौन उत्पीड़न का , दहेज का , छेड़खानी का या इसी तरह का कोई अन्य आरोप लगाकर अपने लिए सहानुभूति बटोर लेती हैं ।  फिर इस सहानुभूति को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती हैं । टी वी पर या सोशल मीडिया पर अपने साथ हुए झूठमूठ के अत्याचार की कहानी सुनाकर सुर्खियाँ बटोरना इनकी आदत में शुमार होता हैं । उनके लिए शोहरत बटोरने का  यह एक बिना मेहनत का रास्ता है जिसमें हींग लगती है ना फिटकरी और रंग भी चोखा होता है ।
                                आज  के समय में बहुत से कानून औरतों के हक में बनाए गए है । इन कानूनों को बनाने का मकसद सिर्फ इतना था कि औरतों को शोषण से बचाया जा सके । आज के समय में इन सब का दुरुपयोग भी बहुतायत में देखा जा रहा है । अभी हाल में ही कोर्ट में भी कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बिना वजह लड़के व उसके परिवार को दहेज के झूठे केस में फंसाया जा रहा है। बहुत से घरों का  शांतिपूर्ण माहौल इसलिए भी खराब हो रहा है कि बहुएं कानून की धौंस दिखाकर सास ससुर के साथ बदतमीजी कर रही हैं उन्हें डरा धमका रही हैं । लड़कों को शादी के बाद  माता पिता से अलग रहने पर मजबूर कर रही हैं । प्रापर्टी में हिस्सेदार बनने के लिए तलाक तक का सहारा लिया जा रहा है । यह सब देखकर बहुत से लड़के तो शादी के नाम से ही डरने लगे  हैं । जिससे आने वाले समय में हमारा सामाजिक ताना बाना ही प्रभावित होने वाला है ।
                                 बलात्कार से संबंधित धारा 376 ने तो मानों औरतों के हाथ एक ऐसा औजार दे दिया है जिससे वो किसी भी पुरुष के अहं को  ना सिर्फ चोट पहुँचा सकती हैं  बल्कि उसका और उसके परिवार की मान मर्यादा को ही खत्म कर देती है । इस तरह के केस में अपने आप को निर्दोष साबित करने की पुरी  जिम्मेदारी पुरुष पर होती है जोकि बहुत ही मुश्किल काम होता है । कई  बार वह स्वयं को निर्दोष साबित करने में सक्षम नहीं होता और उसे अपना जीवन जेल में ही बिताना पड़ता है । कई  बार बेल मिलने पर जेल से तो बाहर आ जाता है परन्तु जब तक मुकद्दमा चलता रहता है वह सामाजिक प्रताड़ना को सहता  रहता है  ऐसे समय में जब जाॅब छूट जाती है तो उसे और उसके परिवार को आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ता है और उसका मनोबल टूट जाता है ।  वह लोगों की तिरछी निगाहें और उनके व्यंग्य बाणों को सहने में स्वयं को असमर्थ पाता है ।
                                                       1960 और उसके बाद  का दौर ऐसा था जिसमें दहेज के लिए बहुत सी औरतों को जलाया गया उनपर तरह तरह के अत्याचार किए गए । समाज में फैली इस कुरीति को समाप्त करने के लिए और दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए 1986  में आईपीसी की धारा 498 -ए का प्रावधान किया गया । आम बोलचाल की भाषा में इसे दहेज निरोधक कानून कहा गया । सभी के द्वारा इस कानून की सराहना की गई । जब इस धारा के अन्तर्गत केस दायर किया जाता था तो यह एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता था और  मुजरिम की जमानत तक नहीं होती थी और  कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान था । उस समय तो ऐसा लगा कि यह कानून दहेज लोभियों  को अच्छा सबक सिखाएगा । लेकिन धीरे धीरे जब इस कानून का दुरुपयोग होना शुरू हुआ तो बहुत से निर्दोष व्यक्ति भी इसकी बलि चढ़ गए  । 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में आधे से ज्यादा मामले झूठे  है । जुलाई 2017 में 498 A में  कुछ  संशोधन किया गया अब पुलिस  आरोपी व्यक्ति की सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकती उसके लिए हर जिले में जो जाँच कमेटी बनाई गई है पहले वह जाँच करेगी और अगर सबूत मिलते है तो ही गिरफ्तारी होगी ।
                                                                 लेकिन सितंबर 2018 की  सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार ये पावर पुलिस को दे दी गई है वह शिकायत कर्ता की शिकायत पर आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती है । जाहिर सी बात है इस कानून के दुरुपयोग की संभावनाए बहुत ज्यादा थी । एक रिपोर्ट के मुताबिक जितने केस दर्ज किए गए है उनमें 80% झूठे हैं । इसलिए 2021 में 498 A की धारा में कुछ बदलाव किए गए है जिसमें अब पुरुषों  को कुछ राहत दी गई है ।

                                      2005 में बनाया गया घरेलू हिंसा के विरूद्ध महिला संरक्षण कानून का भी बहुत दुरूपयोग हुआ है । कई  जगह तो यह मांग भी उठने लगी है कि प्रताड़ित पुरुष कहाँ जाए।  महिला आयोग की तरह पुरुष आयोग भी  बनाया जाना चाहिए जहाँ पुरुष अपनी बात कह सकें और न्याय की उम्मीद रख सकें । न्यायालय को भी इस मामले में अपना नजरिया साफ रखना चाहिए और कानूनों के दुरुपयोग को रोकना होगा।
                                      शोषण के खिलाफ मिले अधिकार
                                       किसी पर भी ना हो  फिर अत्याचार















Sunday, 3 April 2022

शब्द

                शब्द

शब्दों की भी अपनी अलग शान है
कहने को लगते निर्जीव से  है
पर शब्दों में  बड़ी जान है
कई शब्द होते है  ऐसे 
जिनमें समाया सारा जहान है
जादू से होते है कुछ शब्द
दुखी चेहरे की बनते मुस्कान है
कुछ करके अलग शब्दों का इस्तेमाल
समाज में बनाते अलग अपनी  पहचान है
कुछ शब्द होते है ऊर्जावान
जगा देते दबे हुए अरमान है
कुछ शब्दों में छिपी होती है प्रेरणा
वो देते सपनों को नई उड़ान है
शब्द ही बिठाते तख्तो ताज पर
कभी दिलाते कफन का सामान है
मिश्री सी घोलते हैं कभी कान में
कभी बजाते ना भूलने वाली तान है
शब्दों का चयन कैसे करना है
अब तो सिखाने के लिए खुल गए संस्थान है
सोच समझ कर बोला करो यारो
इन्हीं से जग में बनती हमारी पहचान है
शब्द चाहे तोड़ दो दिल ना किसी का तोड़ो
टूटे दिल को जोड़ना फिर नहीं आसान है
शब्द टूटकर नए अर्थ में बदल जाते है
नए अर्थ से रचते इतिहास  महान है
         नीलम नारंग






Monday, 14 March 2022

मुस्कान

 


          मुस्कान

बहुत दिनों से छाया हुआ था कुहासा
घेरे हुए थी उदासियाँ
फैलता जा रहा था अँधेरा
मन के हर कोने में घर बना लिया था
एकाकीपन और निराशा ने
इन सब से ऊब कर चली आई
फिर से ढूँढने खुद को
स्मृतियों के बागान में
याद किए बचपन के वो दिन
जब खेलती थी मस्ती में
अँधेरा होने तलक बिना किसी फिक्र के
याद किए जवानी के वो दिन
जब बेवजह खिलखिलाती थी घंटो
मेरी उस निश्छल हँसी को देखकर
मुस्कुरा उठते थे वो चेहरे भी
जिनपर छाई रहती थी उदासी महीनों
याद किए वो दिन भी
जब बच्चों की मोहिनी मुस्कान से
मुस्कुरा उठी थी भूलकर सब रंजो गम
सालों से ये मुस्कान ही मेरी पहचान है
फिर  क्यूँ कर रही हूँ कैद अब खुद को
कयूँ ओढ़े  हूँ लबादा जिम्मेदारी का
सोचते ही छँट गए बादल निराशा के
फिर करीने से संवारे सफेद बाल
  फिर झुर्रीदार चेहरे पर आई मुस्कान 

Friday, 4 March 2022

जंग

                  जंग

जंग पर भेजने से पहले हर माँ रोई होगी
फिर  रोक आसूँ देख उसे मुसकाई होगी

हर हाल दुश्मन को फतह करके ही आना
मन ही मन होंठों पर यही दुआ लाई होगी

घर पहुंच जाए मेरा लाडला सही सलामत
उस पार भी है एक माँ सोच घबराई होगी

माँ तो माँ  है  इस पार की हो  या उस पार  
सलामती की दुआ उसके होठों पर आई होगी

युद्ध अपने आप में सबसे बड़ा मसला है
युद्ध से मसले हल करने में  सिर्फ बुराई  होगी

युद्ध से सबको सिर्फ तबाही मिलती है
आम जनता ने बार बार ही की ये दुहाई होगी

बेटा इस पार का मरे या मरे उसपार का
आँख तो बस हर औरत की भर आई होगी

अमन शांति भाईचारा  बना रहे सब ओर
नीलम के मन में बस यही दुआ आई होगी
                      

Friday, 18 February 2022

नारी

    नारी


मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई  हूँ अपनी कीमत
अब है  आई मेरी बारी

अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी


ठगी गई  जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी  बनाया कंजक कुँआरी

बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की  हजार जिम्मेवारी

सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती  है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी 

Friday, 11 February 2022

माँ ने कहा

            माँ ने कहा


मैनें कहा माँ कहानी सुनकर
नींद अच्छी आती है
वो हँसती खुश होती
और  कहानी सुनाती पर
अनपढ़ माँ कहाँ से लाती नई कहानियाँ
जो उसने सुनी थी अपने बचपन में
अपनी  माँ नानी या  दादी से
सब तो सुना डाली
हर रोज नई कहानी की जिद से तंग
माँ ने कहा
किताबें पढ़ो
और रूबरू करवा दिया
उसने ज्ञान के उस अथाह सागर से
जो भरा हुआ था
अनगिनत किस्सों कथाओं से
अनसुनी अनकही दास्तानों से
डूब गई उसी में
मिल गया एक नया संसार
हर रोज एक नई कहानी
जब भी कोई नया किस्सा पढ़ती
सुनाती खुश होकर माँ को
एक दिन माँ ने जिद की
कुछ ऐसा सुनाओ जो कहीं नही लिखा
और सुनाने लगी मै कहानियाँ
सिर्फ माँ को  ही नही सबको
मेरी कहानी सुन सो गई माँ
एक लम्बी शाँत नींद में
कभी ना उठने के लिए 

Tuesday, 1 February 2022

खिड़की

 


        खिड़की
बेमकसद तो नही उठे थे कदम
हाँ बस  थोड़ी सी
बेख्याली  जरूर थी
बताना जरूरी भी नही समझा
और क्या बताता
बरबस ही उठ जाते है कदम
उस गली की ओर
खड़ा रहता हूँ
उस घर के आगे
घंटो निहारता हूँ
उस खिड़की को
जहाँ से दीदार होता था यार का
माना अब सन्नाटा पसरा रहता है
पर दिल को कहीं सुकून तो मिलता है
निभा रहा हूँ वफा
तेरी बेवफाई के बाद भी
मेरा वक्त मेरा प्यार
आज भी है बस
सिर्फ तेरे लिए
          

















Wednesday, 19 January 2022

पहली नजर

                पहली नजर


मुझको याद है तेरी पहली सी वो नजर
हो रहे थे तब हम दुनियाभर से बेखबर

कुछ हसरतें संजोई थी उम्रभर के लिए
ना जाने लग गई कब दुनिया की नजर

दूर हो गए  जाने कैसे एक दूसरे से
फिर ना  कर पाए इक दूजे की कदर

फंस कर रह गए दुनिया के झंझटों में
कुछ इस तरह से होती रही बस बसर

जब आए फुर्सत से साथ रहने के पल
तब तक हाथ थामने वाला गया गुजर

जीने को जी रहे है खुश भी रहते है
अकेलापन सन्नाटा कहीं गया है पसर

अब तो बरसों गुजर गए हैं तुझे देखे हुए
नीलम को याद है वो तेरी पहली सी नजर
                     नीलम नारंग



























Thursday, 13 January 2022

सच्चा मित्र

   सच्चा मित्र


खुशियों के आलम में
साथ मुस्कुरा गया
दुख भरे दिनों में
रोते को हँसा गया
जब भी कोई परेशानी आयी
वक़्त साथ बिता गया
आह निकली जब भी लबों से
दुआ सा होठों पे आ गया
राह चलते चलते थक गया कभी
हाथ उसका मेरे हाथों में आ गया
मुड़ा जब कभी किसी गलत  राह पर
रास्ता सही दिखा गया
भटक गया जब किसी के बहकावे से
कदमों को मेरे संभाल गया
जब कभी आ घेरा किसी बीमारी ने
प्यार से माथा मेरा सहला गया
लगता है जन्मों का रिश्ता है तेरा मेरा
हरकदम साथ तू निभा गया
जीवन भर के संघर्ष में साथ रह
सही मायने में सच्चा मित्र हूँ मै
बिन बताए ये बता गया