Monday, 29 June 2020

जीने का हुनर आना चाहिए


 दुःख तो सबके जीवन में है
दुखों का निवारण करना आना चाहिए
दुःख को समझते सभी है
दूसरे की आंख से आंसू पौंछना आना चाहिए
जो किया किसी के लिए नेक काम
नेकियों को दरिया में डालना आना चाहिए
अपने रिश्ते तो सभी के पास है
झुक कर रिश्तों को निभाना आना चाहिए
खिलौने है यहाँ सब माटी के
बनाने के लिए बस मिट्टी को गलाना आना चाहिए
कहने को तो सब साथ होते है
जरूरत पर साथ खङे होना आना चाहिए
ख्वाब तो सभी देखते हैं
बस सपनों को साकार करना आना चाहिए
खुशी देते हैं जो लम्हे हमें
बस खुशी के लमहों को बचाना आना चाहिए
उठना है दूसरे की नजरों में गर
बस अपना वजूद पहचानना आना चाहिए
जीने को तो सब जीते हैं
दूसरों के साथ जीने का हुनर आना चाहिए
क्यू सोचता है गम की बात
बस उनसे इतर मुस्कुराना आना चाहिए
राह दूसरों की आसान करने के लिए
अगुवाई के लिए रहनुमा बनना आना चाहिए

Saturday, 20 June 2020

पापा आज फिर तुम याद आए




   पापा आज फिर तुम याद आए

      ऐसा पहली बार नहीं हुआ
      अक्सर याद आते हो
       बहुत ख़ुशी में या बहुत गम में
      अचानक खाली बैठे हुए
        या कभी भरी महफ़िल में
       या परेशानी में होती हूँ
           सोचती हूँ काश बैठी होती पहलु में
              तुम्हारा प्यार 
          समेट भी नहीं पाई झोली में
          रीता बीता बचपन मेरा   
        कैसे शामिल होऊं हँसी ठिठोली में
     पापा आज फिर तुम याद आए
     जब बैठी दोस्तों की टोली में      

Monday, 8 June 2020

बोझ




                                                   बोझ

                           बोझ बन गयी थी मै बोझ ढोते ढोते
                             ख़ुशी में समेट लिए थे दर्द छोटे छोटे

                           धर दिया था वजूद ताक पर पराई बन
                             भूल गयी थी खुद को दूसरों की होते होते

                            सबकी खुशियों में शामिल हुई हरदम
                                काटी जिंदगी तन्हाई में रोते रोते

                            बांटी खुशियाँ सबकी ना बांटे गम अपने
                          जी जिंदगी अपने में से अपने को खोते खोते

                            बिछा लिए थे कांटे अपनी राहों में हँसते हुए
                            ख़ुशी से दूसरों की राहों में फूल बोते बोते

                            छिपकर ढोती रही अपने अधूरे सपनों को
                           कभी पूरा ना होने की आस में सोते सोते

                         अधूरे सपनों को पूरा करना है नीलम
                        क्या हुआ ढल गयी जो उम्र रोते रोते