Friday, 27 January 2023

वो गलियां

 


           वो गलियां

जैसे-जैसे ये उम्र ढलने लगी है |

पुरानी सी यादें घर करने लगी है||


 याद आते है बचपन के  दोस्त|

वो गालियां भली लगने लगी है ||


वैसे तो जा नहीं पाते उस शहर में|

सपनों में  गलियां भटकने लगी है||


वक़्त की मजबूरी से आ निकले दूर|

 सांसे वहाँ के लिए अटकने लगी है||


अब मिली फुरसत  याद करने की|

वो भी  जब सांस उखड़ने लगी है||

      






Sunday, 22 January 2023

सार यही है

         सार यही है

जिंदगी तेरा सार यही है

तुझसे हमेशा रार रही है


 तमन्ना तो फूलों की थी

तुझसे मिले वो खार सही है


जीत ली थी तुझसे जंग मैनें

जब सब कहते थे हार रही है 


पकड़ा दामन तो छोड़ा नहीं

चाहे अब सब कुछ वार रही है


गहरे समुद्र में उतर के देखा है

क्यूँ लगता जिंदगी थार रही है 


क्यूँ उलझनों के बाद लगता है

परेशानियां दिन चार रही है


किसलिए होती है उदास नीलम

जब खुशियाँ ठाठे मार रही है

      


पहलवान

 खेतां मै काम किया सारी हान

पर पाया ना कदै बी कोई मान


घर मै सबतै लड़कै दिया  होसला

छोरिया नै थामों जीवन की कमान


दिन रात मेहनत कर मिट्टी मै मिट्टी हो

हमनै तो बनाई थी वा ठाढी पहलवान


 अखाड़े मै लड़ी उनां नै दोहरी लड़ाई

लड़न खातर भी करवाई माटी बिरान


खुश होंदे रहे  कसरत करदे देखके

ढोल पीटया जद ले के आई सम्मान


बाहर भी लड़ी अर घर के भीतर भी

इन छोरियां कै होसल्यां नै किया हैरान


करडी सजा मिलनी चाहिए उनां नै

अर मिलै छोरियां नै एक नया जहान 

          










Thursday, 5 January 2023

परिचय

 

क्या परिचय दूं अपना
किसी की बेटी बहन बन
जीवन अपना गुजारती रही
किसी की पत्नी बहु बन
वजूद अपना तलाशती रही
बन खुद से अनजान
दोस्ती रिश्ते निभाती रही
एक खाली कोना सा था कहीं
बस उसके बारे में ही विचारती रही
सास बनी नानी  दादी बनी
अपने वजूद पर प्रश्न उछालती रही
फिर कागज पर लगी लिखने भावनाएँ 
भरते खाली कोने को निहारती रही
पहचान बनी अलग समाज में
अब समझ आया यही था वो मुकाम
जिसे बरसों   मैं खंगालती रही


Tuesday, 3 January 2023

रिश्तों में बर्फ

 

हरदम रूठते रहे तुम मनाते रहे हम
फिर भी रिश्तों में बर्फ सी जमी क्यूँ है

बाद मुद्दत के देखा तुम्हें नजर भर
नजर आई  इन आंखों में नमी क्यूँ है

ढल रहा है सूरज आसमान में देखो
नजर आती चारों तरफ  घूल जमी क्यूँ है

शहरों में चारों तरफ शोर चिल्लाहट है
गाँवों में जिंदगी की ये रफ्तार थमी क्यूँ है

स्वार्थ लालच से बनते हैं रिश्ते शहरों में
गाँव में इन सब जज्बातों की कमी क्यूँ है