कुछ ख्वाहिशे
जब भी निहारती हूँ आसमाँ को
बन उन्मुक्त पंछी गगन को छूना चाहती हूँ
घिर आए काले बादलों को देख
बन पानी की बूंद उसमें समाना चाहती हूँ
एकसार बहते समुद्र को देख
पानी की बूंद सा गिर सीप बन जाना चाहती हूँ
अनजान सी राहों पर चलकर
अपने पैरों के निशान छोड़ना चाहती हूँ
औरत मर्द के भेदभाव को मिटा
इंसानियत से इंसान की पहचान चाहती हूँ
रात के अंधेरे में कहीं भी बैठ
कुछ देर दिल खोलकर हँसना चाहती हूँ
मुरझाए हुए दागदार चेहरे को
घंटो दर्पण में खुद को निहारना चाहती हूँ
लाख कमियाँ होगी मुझमें
उनसे इतर खुद को तराशना चाहती हूँ
पकड़ ली है नई पगडंडी मैनें
सब कुछ छोड़कर खुद को तलाशना चाहती हूँ
असमंजस सी में है नीलम
पूछती हूँ खुद से क्या कुछ गलत तो नही चाहती हूँ
बात करते है
बैठ मेरे पास कुछ राज की बात करते है
ए जिन्दगी तेरे मिजाज की बात करते है
ढूँढनी चाही थी जब महक फूलों की
मिले जो खार उसकी ही बात करते है
चलना चाहा जब जाने पहचाने रास्ते पर
तेरी दिखाई अनजान डगर की बात करते है
माना रास्ता लम्बा था संघर्ष से भरा हुआ
चल छोड़ खुशी से मंजिल की बात करते है
राह में कौन मिला बिछड़ा जाने दो सब
जिसने साथ निभाया उसकी बात करते है
किसने हँसी उड़ाई किसने जख्म दिए
चल मरहम लगाने वाले की बात करते है
कयूँ रखे आँख से निकले आँसू का हिसाब
लब पर बिखरी मुस्कान की बात करते है
कुछ हसरते तो सबकी अधूरी रहती है
हम तो जो पुरी हुई उनकी बात करते है
रोने वाले को ही ओर भी रुलाती है
ये दुनिया जिसकी हम सब बात करते है
चलो भूल जाते है अतीत के दिए दर्द को
बस आज के सुख की नीलम बात करते है