Tuesday, 1 December 2020

तेरी मेरी परछाई

 तेरी मेरी परछाई 


खवाबों में कुछ खयाल बुने जिसमें
शामिल थे मै और मेरी तन्हाई
आधे अधूरे से उन खवाबों में जाने
क्यू नजर आई तेरी मेरी परछाई

ढूँढने लगी दिन वो अतीत के
जिसने पींग प्यार की डलवाई
बन हमसफर साथ तेरे चली मै
अपने आप से ही मै सकुचाई

दिन थे हसीन चारों तरफ बहार
उतर गई ओढनी और मै शरमाई
दोनों हाथों में थाम चुननर देखा
मिली नजरें जैसे ही चली पुरवाई

दिल ने बात की बढ गई धड़कने
डर गई हो ना जाए जगहसांई
सिमट गई अपने आप में ही
बैठ गया दिल हो ना जाए रुसवाई

थाम हाथों में हाथ पाई दहलीज नई
मिला साथ तेरा मिली मंजिल नई
नए गीत नए रिश्ते हर बात नई
तेरे मेरे मन में बज रही थी शहनाई


Friday, 20 November 2020

याद आने लगे है

 याद आने लगे है 


नए सब्जबाग कयूँ दिखाने लगे हैं
छोड़ महबूब का घर वो आने लगे हैं

बागी हो उठे हैं तेवर देखकर उन्हें
कयूँ रोज नए नजराने लाने लगे हैं

हो जाऊँगी एक दिन मै उसकी
कयूँ मन अपना रोज भरमाने लगे हैं

दोस्ती प्यार में बदलती नहीं यूँ
बेवजह हक अपना जताने लगे हैं

माना सांझी यादें है कुछ बरसातों की
कयूं बातें पुरानी याद दिलाने लगे हैं

हर फासले तय किए है साथ साथ
किसलिए चाहत नई फरमाने लगे हैं

साथ रहने की हसरत पाल ली है
कयूँ ऐसे सपने मन में सजाने लगे हैं

जानते हो फर्क नहीं था तेरे मेरे बीच
अब कैसे बेवजह शान दिखाने लगे हैं

दरक गया जो रिश्ता वक्त ओ हालात से
दोबारा उसके फसाने कयूँ बनाने लगे हैं

खत्म हो गए थे एहसास जिसके लिए
बीते वक्त की बात कयूँ दोहराने लगे हैं


Friday, 13 November 2020

दिवाली

 दिवाली 

मैं एक कुम्हार
चाक पर करता जाँ न्योछार
मेरे सपने सजते जाते
जैसे जैसे मिट्टी ले आकार
मेरे घर भी मने दिवाली
आए मिठाई और फलाहार
चाक पर जल्दी हाथ चलते
ख़ुशियों का ना कोई पार
बिक जाए सारा सामान
भर जाए मेरे भी भंडार
मन मे सपने सजाए
करते जाए सारे कार
नीलम की भी है यही हसरत
इसकी सुने सब परिवार
मत करना इसको रुसवा
कर रही यही प्रार्थना बारमबार
दीए जलाओ ख़ुशियाँ मनाओ
चारों ओर लाओ नई बहार
सबके घर मने दिवाली
मन से दिए बनाए कुम्हार 

Friday, 6 November 2020

चुनाव

                                  चुनाव 


           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
मंजर से बदलने लगे हैं
कुछ लोग निखारने लगे हैं
सीधे मुँह बात ना करने वाले
सहानुभूति सी जताने लगे है
             चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
              लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
नए सब्जबाग दिखाने लगे हैं
पलकों पर सपने सजाने लगे हैं
गरीबों का हक मारने वाले
गरीबी हटाने की बात कराने लगे हैं
                         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                       लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
खोलने लूट के खजाने लगे हैं
अपराध का ग्राफ बढ़ाने लगे हैं
शायद जीत मिल जाए ऐसे ही
होड़ में गुंडागर्दी दिखाने लगे हैं
                           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं 
बात करते हैं आधी आबादी के हक की 
टिकट माँगने पर आँखे दिखाने लगे हैं
ढहाते  हैं जुल्म औरतों पर गाहे बगाहे
अब आबरू बचाने की बात करवाने लगे हैं
         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं 
         लगता है फिर चुनाव करवाने  लगे हैं 




Friday, 30 October 2020

बिन तेरे

 बिन तेरे 


तेरे बिन जो गुजरी कैसी ये रात आई है
बिन तेरे कैसी सावन की बरसात आई है

हर लम्हा जो गुजरता था साथ तेरे
आज कैसी ये कयामत की रात आई है

चेहरे से मुसकान उतर गई नकाब की तरह
पलकों के हिस्से आँसू की सौगात आई है

तेरे चेहरे को देखे बिन देखी दुनिया
आज कैसी ये मनहूस प्रभात आई है

नजरों से ना जुदा होते थे पल भर भी
उम्रभर जुदा रहने की बात आई है

ना कोई गिला ना शिकवा बस बेबसी
आज कैसी ये आखिरी मुलाकात आई है

चुपचाप नजरों में बसाना है हमेशा के लिए
आज विधाता की ये कैसी करामात आई है











Wednesday, 7 October 2020

कसक बाकी है

 कसक बाकी है 


उन उजले चंद लमहों की कसक बाकी है
आज भी तुझसे मिलने की ललक बाकी है

पहला फूल जो दिया पयार के इजहार में
आज भी सांसों में उसकी महक बाकी है

मिश्री से शब्द जो बोले थे कानों में कभी
आज भी कान में बोल की खनक बाकी है

डाल हाथों में हाथ चले थे जब साथ साथ
लड़खड़ाते से उन कदमों की चहक बाकी है

संजोए थे जो सपने हमनें सुनहरी शाम के
तेरी याद के सहारे छूना वो फलक बाकी है

नाराजगी जो कभी जाहिर की प्यार से
अलग अंदाज से मनाने की सनक बाकी है


मुझे देखकर आ जाती थी तेरे चेहरे पर रौनक
दिल में बसी वो तेरे चेहरे की झलक बाकी है


रूठ कर चले गए जो मझधार में छोड़कर
आज भी नीलम की नम हुई पलक बाकी है








Sunday, 27 September 2020

बेटी जैसा

 बेटी जैसा 

मुझेभी अब समझ आया
जब क्षीण हो गयी काया
अकेलेपन में विदा की हुई
बेटी का हँसता चेहरा नजर आया
हाय रे
सब बेटी को ही कयूं बतलाया
बेटे को क्यु ना कुछ समझाया
क्यु ना डाली घर की जिम्मेदारी
क्यु ना घर का काम सिखाया
जब घर दो लोगों का है
तब दोनों को क्यु ना बराबर समझाया
बचपन में जो था पढाना
ज़वानी में भी ना पढाया
खुशियों में ना साथ हँसाया
दुखों में ना पास बैठ रुलाया
जब बेटी को बेटे जैसे पाला
निर्भीक बना भेजा बाहर
अपनी रक्षा को सक्षम बनाया
तो क्यु ना बेटे को बेटी जैसे बनाया
रोटी बनाना कपड़े धोना सिखाया
चूक हुई मुझसे ही कहीं
अब बेटे को ही क्यु दोषी ठहराया
एहसास तो गलती का उसे भी है
ऐंठ में गलती मानना भी कहां भाया
अब भी वक़्त है संभल जाओ ए माओं
बेटे को कुछ कुछ बेटी जैसा बनाओ
नीलम नारंग 

Sunday, 23 August 2020

इंसान आज का

                 कल की इंतजार में खो गया समां आज का 

                  कुछ इस कदर हो गया इनसान आज का


                  कल होगा आज से भी बेहतर इसी सोच में 

                  कैसे कब बेमक़सद हो गया इनसान आज का 


                 आज की खुशियों को रखा गिरवी कल पर 

                   फ़िर आज को ना जी पाया इनसान आज का 


                   बनाने कल को बेहतर चल रहा है शूलो पर 

                   निहार फूलों को ना पाया इनसान आज का 


                  लगी रही होड़ उम्र भर दूसरों को पछाड़ने की 

                 अपने आप से जीत ना पाया इनसान आज का 


                 हर साल खुश हो जलाता रहा पुतला रावण का 

               राम सा ना बना पाया खुद को इंसान आज का 


               

Wednesday, 12 August 2020

Be Positive

 


   At the end of taking online class I wrote a message to be positive . After that , I kept my phone aside and got busy in domestic work . Some time later , I checked my phone to see so many missed calls and messages . One of the parents had questioned what type of teacher I am ? Why you want to make our children positive ? I looked the message and realized my mistake . I deleted it and wrote sorry with great smile. 

Tuesday, 11 August 2020

देश प्रेम

 


                                देश प्रेम 

                 देश प्रेम सीमित नहीं होता 

                 देश की आजादी  तक 

                  ये चलता रहता है 

                 हर एक को इन्साफ मिलने तक 


              देश प्रेम निहित नहीं होता 

            देश प्रेम के सपनों तक 

        ये चलता रहता है 

       हर एक के सपने साकार होने तक 


                    देश प्रेम प्रतीत नहीं होता 

            कुछ हाथों में सत्ता होने से 

           संघर्ष चलता रहता है

           सबके सत्ता में शामिल होने तक 


            देश प्रेमी खुश नहीं होता 

         कुछ लोगों के खुश होने पर 

       वो इन्तजार करता है 

      सबका खुशियों में शामिल होने तक 



Tuesday, 4 August 2020

कठिन दौर




                                      कठिन दौर 

                   ये कैसा कठिन दौर है आया 
                  अपनों को अपनों से डराया 

                वायरस को समझ नहीं पाया 
                 हर तरफ  है  खौफ का साया 
             
              रोज की भागदौड़ ने छकाया 
              वायरस ने घर में कैद करवाया 

              मजदूरों को घर से बेघर करवाया 
              तपती धूप में सड़को पर भगाया 
  
                माली हालत ने सबको सताया 
                दूरियों की जरुरत का समझाया 

              नियम बनाकर सबको समझाया 
              समझ कर भी समझ न कोई पाया 

              घर की जिमेदारी ने सबको भगाया 
               डर के साए ने भी हौसला बढाया 

                जीने का नया पाठ बच्चों को पढाया 
              अपना बचपन फिर से याद करवाया 


          

Tuesday, 28 July 2020

देश के पहरेदार




                   देश के पहरेदार

          हो रही है कैसे  जिंदगी की
          गुजर बसर देख लो
        मच रही है हाय तौबा चारों ओर
       घुमा के नजर देख लो

      डूब रहे है लोग बाढ़ के पानी में
      मचा हाहाकार देख लो
     छोड़ कर हित जनता के नेता लड़ते
       वोट के खरीददार देख लो

       लड़ा देते है इंसान को इंसान से
       ऐसे देश के पहरेदार देख लो
       धर्म के नाम पर आपस में कटते मरते
        लोग जिम्मेदार देख लो

       करके झूठे वादे आ जाते राजनीति में
       नहीं होते सपने साकार देख लो
       लूट खसोट मचाते दूसरों को लड़वाते
       राजनीति के ठेकेदार देख लो 

Tuesday, 21 July 2020

अखबार आज का



                                     अखबार आज का

       अबूझ पहेलियों से भरा है अखबार आज का
       बस बता रहा जातीय समीकरण आज का

       पेज भरा हुआ है मौज मस्ती के विज्ञापनों से
      दूसरी ओर बेजार फटेहाल मजदूर आज का

      एक पेज पर है अधनंगी तस्वीरें औरतों की
     कुछ की मजबूरी कुछ मजा लेती आज का

      बांटते कम हैं राशन दिखावा करते ज्यादा
      कुछ इस तरह हो गया है सेवादार आज का

        हर तरफ डर परेशानी बढ़ता दायरा शक का
       बढ़ गया संक्रमण ख़राब है माहौल आज का

       ऐसे में भी लगे हैं बटोरने चोरी का धन माल
     कितना खुदगर्ज हो गया है इंसान आज का

      सच से कोसो दूर है नहीं जगह है समानता की
      अखबार नहीं  दिखा रहा झूठ फरेब आज का  

Tuesday, 14 July 2020

बूँद



                             बूँद
      जब भी भर जाती हो गुब्बार से
      दब जाती हो अपने ही बोझ से
      बरस के खुद को हल्का कर लेती हो

     गिर के धरती पर बन दूसरे की ख़ुशी
     बन पानी समा जाती हो धरती में
     बन बूँद कभी खुद को सीप कर लेती हो 

     पैदा कर देती हो चमक आँखों में
    लहलहाती फसल देखकर
    बन बूँद किसान को खुश कर लेती हो

     देखकर तुझे हर्ष उठता है प्रेमी
     साहस मिलता है प्रणय निवेदन का
    बन ख़ुशी प्रेमी की आँखें नाम कर लेती हो  

Tuesday, 7 July 2020

पहेली सी जिंदगी





                   जो कभी थी बहुत प्यारी मुझे
               अब बन गयी पहेली जिंदगी

             खुशियाँ ना रास आई इसको
             हो गयी कितनी अकेली जिंदगी

              थे हर तरफ हरियाली और गुलाब
              बन गयी जैसे फूल चमेली जिंदगी

              रिपु सी लगने लगी है अब 
              कभी थी जो प्यारी सहेली जिंदगी

             हारना तो मुझे भी नहीं है तुझसे
            सोच लूंगीमिली नई नवेली जिंदगी


























































           

Monday, 29 June 2020

जीने का हुनर आना चाहिए


 दुःख तो सबके जीवन में है
दुखों का निवारण करना आना चाहिए
दुःख को समझते सभी है
दूसरे की आंख से आंसू पौंछना आना चाहिए
जो किया किसी के लिए नेक काम
नेकियों को दरिया में डालना आना चाहिए
अपने रिश्ते तो सभी के पास है
झुक कर रिश्तों को निभाना आना चाहिए
खिलौने है यहाँ सब माटी के
बनाने के लिए बस मिट्टी को गलाना आना चाहिए
कहने को तो सब साथ होते है
जरूरत पर साथ खङे होना आना चाहिए
ख्वाब तो सभी देखते हैं
बस सपनों को साकार करना आना चाहिए
खुशी देते हैं जो लम्हे हमें
बस खुशी के लमहों को बचाना आना चाहिए
उठना है दूसरे की नजरों में गर
बस अपना वजूद पहचानना आना चाहिए
जीने को तो सब जीते हैं
दूसरों के साथ जीने का हुनर आना चाहिए
क्यू सोचता है गम की बात
बस उनसे इतर मुस्कुराना आना चाहिए
राह दूसरों की आसान करने के लिए
अगुवाई के लिए रहनुमा बनना आना चाहिए

Saturday, 20 June 2020

पापा आज फिर तुम याद आए




   पापा आज फिर तुम याद आए

      ऐसा पहली बार नहीं हुआ
      अक्सर याद आते हो
       बहुत ख़ुशी में या बहुत गम में
      अचानक खाली बैठे हुए
        या कभी भरी महफ़िल में
       या परेशानी में होती हूँ
           सोचती हूँ काश बैठी होती पहलु में
              तुम्हारा प्यार 
          समेट भी नहीं पाई झोली में
          रीता बीता बचपन मेरा   
        कैसे शामिल होऊं हँसी ठिठोली में
     पापा आज फिर तुम याद आए
     जब बैठी दोस्तों की टोली में      

Monday, 8 June 2020

बोझ




                                                   बोझ

                           बोझ बन गयी थी मै बोझ ढोते ढोते
                             ख़ुशी में समेट लिए थे दर्द छोटे छोटे

                           धर दिया था वजूद ताक पर पराई बन
                             भूल गयी थी खुद को दूसरों की होते होते

                            सबकी खुशियों में शामिल हुई हरदम
                                काटी जिंदगी तन्हाई में रोते रोते

                            बांटी खुशियाँ सबकी ना बांटे गम अपने
                          जी जिंदगी अपने में से अपने को खोते खोते

                            बिछा लिए थे कांटे अपनी राहों में हँसते हुए
                            ख़ुशी से दूसरों की राहों में फूल बोते बोते

                            छिपकर ढोती रही अपने अधूरे सपनों को
                           कभी पूरा ना होने की आस में सोते सोते

                         अधूरे सपनों को पूरा करना है नीलम
                        क्या हुआ ढल गयी जो उम्र रोते रोते 










                 

Sunday, 31 May 2020

कोरोना

                               कोरोना

                 दिन भर चर्चे तेरे हर महफ़िल में
                 कोरोना कोरोना कैसी तू कोरोना

                  बिठा दिया है डर सबके दिलों में 
                  क्या होगा कैसे होगा बस ये रोना

               नहीं दवाई इसकी ना कोई वैक्सीन
               अब चुप है सब करने वाले जादू टोना

                 आशावान रहो उर्जावान रहो खुश रहो
                   खुशियाँ बांटो बस प्यार तुम करोना

                  मस्त रहो सब ये कहना है नीलम का
                 मत सोचो ज्यादा होने दो जो है होना

Monday, 25 May 2020

कोरोना वायरस

               



                                कोरोना  वायरस
                       छिड गई कैसी ये बहस  यार
                     वायरस है ये या जैविक हथियार
                     जीने की आस में भागते लोग
                     मौतों का लग गया है अम्बार
                      बेबस हो गई है दुनिया सारी
                     सुने पड़े मंदिर सुने पड़े मजार
                     खाने कमाने के लाले पड़ गए   
                      रोटी में ही खर्च  हो गयी पगार
                    रोज की ताजा  कमाई वाले बेबस
                    आ गए सड़को पर छोड़ घर बार
                  लौट चले गावों को पैदल ही
                 अज्ञानता के वश हो गए लाचार
                  औरत बच्चे बूढ़े और नौजवान
                  निकले घरों से भर मन में गुब्बार
               छुट गए कमाई के साधन
               सुनी हो गयी गलियां सुने हुए बाज़ार
              लगे जो दिन रात दूसरों की सेवा में
                 दे कर दुआ करें उनका मंगलाचार
                 बचे रहे बीमारी से सब मानस
              सबके लिए करे  प्रार्थना बारम्बार
            स्वस्थ रहें सब बांटे खुशियाँ सबमें
            भागे बीमारी आये नीलम को करार

Thursday, 21 May 2020

जीने की कला




                             जीने की कला
21वी सदी का दौर या यूँ कहे कि आज का दौर पिछली सभी सदियों से भयानक और डराने वाला है आज तक ऐसी कोई महामारी नहीं आई जिसने  एक साथ सारे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया हो |
अलग अलग समय पर अलग अलग क्षेत्रों में महामारियां फैलती रही है परन्तु इस तरह की स्थिति कभी भी आई जब सब कुछ एक साथ लॉक डाउन हो गया हो और लोगों के मन में इस तरह की दहशत घर कर गयी हो |
                लेकिन जैसा कि कहा जाता है अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो वह आने वाले उजाले की किरण को रोकने में असमर्थ होता है | एक टिमटिमाते दिए की रौशनी और आशावादी सोच गहन से गहन तिमिर को भी फैलने से रोक देती है और कहीं न कहीं हमें उजाले की ओर अग्रसर कर देती है | आज का दौर इसका जीता जागता उदहारण है |
                        प्रकृति को ले या मानवीय संवेदनाओं की बात करे तो आज का समय अपनी उत्कृष्टता में अव्वल दर्जे पर है | लोग भयभीत जरुर है परन्तु उनकी कर्तव्यपरायणता ने परकाष्ठा की सारी सीमाएं लांघ दी है डॉक्टर , पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी अपने कर्तव्यपथ पर चलते हुए प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे है , लोग भी उनको सम्मानित कर रहे है , उनपर फूल बरसा रही है और दिल से उन्हें दुआएं दे रहे हैं | 
                                             इसके अलावा बहुत से ऐसे लोग है जो अन्य बहुत से कामों में लगे हुए है |कुछ लोग गरीबों को खाना पहुंचा रहे है , कुछ दवाइयां पहुंचा रहे है , कुछ मरीजों की सेवा कर रहे है , कुछ मरीजों के परिजनों की देखभाल कर रहे है | बहुत से लोग घर बैठे खाना बनाने का काम कर रहे है | जिसकी जैसी सोच है या जिसका जितना सामर्थ्य है हर कोई समाज के लिए कुछ न कुछ कर रहा है|
                                       
                             इस मुश्किल की घडी को सहज और सरल बनाने में महिलाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिन्होंने पति और बच्चों को घरों से जोड़े रखा |  उनके खाने पीने का ध्यान रखा और लगभग हर तरह का व्यंजन घर में बना कर खिलाने की कोशिश की | सारा दिन अपने आपको मुस्कुराते हुए घर के कामों में व्यस्त रखा |
                        बहुत से लोग तो ये भी मानते है कि वो अपने काम में और पैसा कमाने में इतने व्यस्त हो गए थे कि जिंदगी का असली स्वाद भूल ही  गए थे | उन्होंने इस समय को भगवान् की तरफ से दिये गए वरदान की तरह माना और अपनी छिपी हुई प्रतिभा को निखारने में लगा दिया |
                   बहुत से लोग निराश भी हुए है लेकिन आशावादी लोगो की संख्या ज्यादा है | वक़्त बुरा है इसका मतलब ये भी नहीं कि हम सारा समय रोने में ही बिता दें हमें ये सोचना होगा कि ऐसे समय में हम समाज को क्या दे सकते हैं और समाज में रहने वाले लोगों का साथ किस तरीके से दे सकते है |
                 माना दौर बुरा है पर डरावना नहीं है
                सीखाना है मुस्कुराना रोना नहीं है 

Saturday, 16 May 2020

बिखरती खुशबू

                    


                          बिखरती खुशबू 
           
               कुछ लोग राह में कांटे बिछाते चले गए
              हम भी बगिया में फूल महकाते चले गए

              वो दुनिया से कमतर जताते चले गए
             खूबियाँ हम भी अपनी बताते चले गए

             हर दुःख का कारण मुझे ठहराते चले गए
             हम भी प्यार की खुशबू बिखराते चले गए

           वक़्त से दुनिया से हमेशा डराते चले गए
           उनके प्रति इस  प्यार को गहराते चले गए

           बात बात पर दर्द मेरा सुलगाते चले गए
            हम  भी उनको अपना कहाते चले गए

           खुशियाँ बटोरने आये थे बटोरते चले गए
         सबके अपने कर्म है नीलम कमाते चले गए 
         

Saturday, 9 May 2020

माँ का सपना




                                                           माँ का सपना
                                   जहाँ भी जाती हूँ तेरा ख्याल साथ रहता है
                                  उलझनों में जब  जब घिरी मेरी जिंदगी
                                 हर कदम लगा तेरा साया साथ रहता है

                                चल रही हूँ उस रास्ते पर जो दिखाया था
                                हर दम ही माँ तेरा प्यार साथ रहता है

                              जब भी लाड़ प्यार लड़ाती हूँ बच्चों से
                              करती हूँ याद तेरा दुलार साथ रहता है

                            दी थी जो सीख जिन्दादिली से जीने की
                           तेरी उस सोच का परिणाम साथ रहता है

                         जब भी लिखती हूँ भावनाएं पन्नों पर
                           तेरे साथ जिया हर लम्हा साथ रहता है

                         देखा था जो सपना कभी मेरे लिए तुमने
                         लिखती हूँ जब भी तेरा सपना साथ रहता है

                       माना नहीं हो इस दुनिया में अब साथ मेरे
                     तेरी याद तेरा सपना नेलं के साथ रहता है 

                             
       

Sunday, 3 May 2020

प्राइवेट स्कूल शिक्षक


                      प्राइवेट स्कूल शिक्षक
आज के भय भरे माहौल में हर कोई आहत है | डरा हुआ है और कुछ हद तक ये डर जायज भी है | चीन , इटली ,अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के हालात देखने के बाद हमारा डरना वाजिब भी है और जरुरी भी | हालाँकि सरकार के प्रयासों से इस को फैलने से काफी हद तक रोक भी लिया गया है |
                विश्वव्यापी महामारी के इस कठिन समय में बहुत से लोग जैसे डॉक्टर , पुलिस कर्मचारी , सफाई कर्मचारी और बहुत से अन्य लोग भी अपना अथक योगदान दे रहे है | इसके साथ साथ कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं और उनसे जुड़े लोग भी है जिनका हर संभव प्रयास है कि जिनको कहीं से सहायता नहीं मिल रही उन तक पहुँच कर उनकी मदद करना |
                     इन सब के अलावा एक वर्ग ऐसा भी है जिसे बच्चों के भविष्य की बहुत चिंता है वो हैं प्राइवेट शिक्षक | तमाम तरह की आलोचनों के बीच चुप चाप अपने भविष्य से बेखबर बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा हुआ है | जिनका एक ही मकसद है ऐसे भयावह माहौल में भी बच्चे शिक्षा ग्रहण करते रहे अपनी सीखने की प्रक्रिया से जुड़े रहे और उनका मन बहलता रहे |
                  जब आन लाइन शिक्षण की बात उठी तब  बहुत से शिक्षक ऐसे थे जिन्हें नई तकनीक का ज्ञान नहीं था उनके लिए ये एक बहुत ही मुश्किल काम था लेकिन जैसाकि शिक्षण शब्द का अर्थ है सीखने सीखाने की प्रक्रिया , उसी को अपनाते हुए उन्होंने नई तकनीक का प्रयोग पहले स्वयं सीखा फिर बच्चों को सीखाना शुरू किया | इसके लिए उन्हें सात आठ घंटे काम करना पड़ रहा है |
                 बच्चों को पढाया हुआ पाठ समझ आ जाए इसके लिए वह अलग अलग विधा का प्रयोग कर रहे है | हालंकि सरकारी स्कूल के शिक्षक और प्राइवेट स्कूल के शिक्षक के वेतन और काम में जो अंतर है वो तो जगजाहिर है ही | आज ऐसे समय में भी उसके बारे में कुछ नहीं सोचा जा रहा केवल आलोचना ही की जा रही है |
                  फीस का तो सबने सोच लिया किसी ने भी यह नहीं सोचा कि उनके घर कैसे चलेंगे | वो अपने बच्चों का पालन पोषण कैसे करेगा | हर बार उन्हें ही क्यों बलि का बकरा बनाया जाता है | आज की मुश्किल घडी में उनके जज्बे और जोश को सलाम नहीं कर सकते तो कम से कम आलोचना से तो बचा ही जा सकता है और बचना भी चाहिए |
                 उठो आज फिर जलानी नई मशाल है
                   करे शुरू अपना काम क्या ख्याल है   

Thursday, 30 April 2020

मेरा हाल

             

                                     मेरा हाल
               कुछ सोचा क्या होगा मेरा हाल
             बेघर हूँ रहता हूँ  सड़को पर दिन रात
               इसलिए सबसे  पूछता हूँ ये  सवाल
          बंद है सब   क्या खाऊंगा रहूँगा कहाँ
          कुछ तो बताओ जिससे बदले मेरी  चाल
            कोई करे मेरे भी खाने का इंतजाम
              इस तरह से मै भी लूँ पेट पाल
                मजदूरी नहीं काम नहीं पैसा नहीं
               नहीं है मेरा पास कोई असबाब माल
                 बचाना चाहता हूँ मैभी देश को
                    मुझे भी रखना है दूसरों का ख्याल
                   मेरी खुशकिस्मत होगी काम आऊ मै
                   करना न चाहूँ देश का बांका बाल
                      कहो या सोचो मेरे बारे में भी
                             इस तरह हो जाऊ मै निहाल



Thursday, 23 April 2020

चाहत

                                               

                                                     चाहत
            बहुत भटक लिए बस यूँ ही बेखबर होकर
            तुझे करीब लाना होगा सोच समझ कर

             ए जिंदगी कुछ खफा सी हो करीब होकर
             क्यों न ऐसा करे बस रह जाए तेरे होकर

             गवां दी उम्र तेरा होने की चाहत लेकर
            काश जी लिए होते किसी और का होकर

            सपने और हकीकत का फासला न समझ पाए
           उलझते रहे दोनों के बीच मरे भी  तबाह होकर 

Wednesday, 15 April 2020

Temple vs Schools






                                               Temples VS schools
Neha is working in a multinational company and living in Delhi . She belongs to Kerala . She is very fond of traveling. Once she got a chance to survey the roads of villages of Haryana. She visited so many villages . She observed that in each village there is a splendid temple. but the building of schools are  not in a good position. She asked her question to one of the villagers the reason behind it . Why people are making temples not schools. The villager replied its government duty to provide schools. What can people do for It . His answer shocked Neha . She thought how our India become a developed country still people are not aware about education. They believed on miracles and God .
         

Wednesday, 8 April 2020

कोई याद आया

                       

                                 कोई याद आया
                  बैठे हुए ये किसका ख्याल आया
                 भुला हुआ कोई शख्स याद आया

                  छोड़ आये थे जो रास्ता कभी कहीं
                 फिर क्यू  उसका मलाल आया

                   ख़ुशी से बढ़ते रहे जिंदगी की डगर पे
                   गम में ही क्यू नजर वो साथ आया

                 भटक रहे थे जब मंजिल की तलाश में
                बन एक नई रौशनी राह दिखाने आया

               भूल गयी थी जब अपने आपको ही
                  बन साथी मेरा वजूद याद दिलाने आया

               छोड़ दिया था जिसे बीच डगर पर
                मुद्दत बाद भी साथ उसे खड़ा पाया

               बिना हसरतों के जीना जब चाहा
                  हाथ बढ़ा कदम साथ मिलाने आया

                 आज  जब सिमटे है सब अपने आप में
                 वो  चलन फिर दोस्ती का सिखाने आया 

Tuesday, 4 February 2020

औरत




                    हाथों से काम करते हुए भी
                    बुन लेती है ख्वाब कई
                   ये औरत है जनाब
                 खवाबो को पूरा करने के लिए
                 एक जिंदगी में जी जाती है
                   जिंदगियां कई