221, 2122, 221, 2122
1.ये सच है मेरी कर्मों का ही सबाब हो तुम
मेरे लिए ये मीठी धुन सी रबाब हो तुम
2.यूं तीरगी में खुद को, अक्सर उदास पाकर
कहती थी जिंदगी को कब से अजाब हो तुम
3.आँखों ने प्यार सारा जाहिर ही कर दिया जब
फिर लब से चाहते क्यों सुनना जवाब हो तुम
4.फैला दी है जो हिंसा नफ़रत समाज में अब
कहते हो फिर ज़माने को ही खराब हो तुम
5.बाहर कदम ना रखने देगा समाज नीलम
खुलकर खुली हवा में जीना भी खाब हो तुम

