Tuesday, 17 May 2022

कुछ ख्वाहिशे

                              कुछ ख्वाहिशे


जब भी  निहारती हूँ आसमाँ को
बन उन्मुक्त पंछी  गगन को  छूना चाहती हूँ
घिर आए काले बादलों को देख
बन पानी की बूंद उसमें समाना  चाहती हूँ
एकसार बहते समुद्र को देख
पानी की बूंद सा गिर सीप बन जाना चाहती हूँ
अनजान सी राहों पर चलकर
अपने पैरों के निशान छोड़ना चाहती हूँ
औरत मर्द के भेदभाव को मिटा
इंसानियत से इंसान की पहचान चाहती हूँ
रात के अंधेरे में कहीं भी बैठ
कुछ देर  दिल खोलकर हँसना चाहती हूँ
मुरझाए हुए दागदार चेहरे को
घंटो दर्पण में खुद को निहारना चाहती हूँ
लाख कमियाँ होगी मुझमें
उनसे इतर खुद को तराशना  चाहती हूँ
पकड़ ली है नई पगडंडी मैनें
सब कुछ छोड़कर खुद को तलाशना चाहती हूँ
असमंजस सी में है नीलम
पूछती हूँ खुद से क्या कुछ गलत तो नही चाहती हूँ


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