दुख बहुत मिले इस जिंदगानी में
देख इन गमों को बल पड़े पेशानी में
कभी ढूँढनी चाही ही नहीं खुशियाँ
बस हरदम घूमते रहे परेशानी में
जिंदगी को लेकर बुने थे जो ख्वाब
बुलबुले की भांति बह गए पानी में
टूटा हुआ दिल लिए फिरते रहे यूँ ही
रो कर ही काट लिये दिन जवानी में
फिर एक दिन सोचा खुद के बारे में
आ गया उस दिन एक मोड़ कहानी में
जीने लगी अब एक नई सी दुनिया में
जिंदगी चलने लगी फिर से रवानी में
छोड़ सब गम खुद को दी नई मुस्कान
छोड़ कर दिया खुद को हवा सुहानी में
अब समझ आया वो जिंदगी ही क्या
हंसते हंसते जो कट जाए आसानी में
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