आँखे
कयूँ राज दिल के खोल गई आँखे
लब चुप रहे पर सब बोल गई आँखे
अश्क अभी ढलकने को ही था
उसमें गम का वजन तोल गई आँखे
लब तो मशगूल रहे मुस्कुराने में
दर्द-ए-दिल की खोल पोल गई आँखे
गलत नजरों ने जब देखा किसीने
सबकी नजर में जहर सा घोल गई आँखे
अंधेरों में जीने की आदत थी जिनको
मिली रोशनी तो बन अनमोल गई आँखे
देखा किसी ओर को तड़पते हुए दर्द से
सीने में उठा दर्द और डोल गई आँखे
मसला आया इकरार और इसरार का
इश्क में बेवजह कर कलोल गई आँखे
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