कल की इंतजार में खो गया समां आज का
कुछ इस कदर हो गया इनसान आज का
कल होगा आज से भी बेहतर इसी सोच में
कैसे कब बेमक़सद हो गया इनसान आज का
आज की खुशियों को रखा गिरवी कल पर
फ़िर आज को ना जी पाया इनसान आज का
बनाने कल को बेहतर चल रहा है शूलो पर
निहार फूलों को ना पाया इनसान आज का
लगी रही होड़ उम्र भर दूसरों को पछाड़ने की
अपने आप से जीत ना पाया इनसान आज का
हर साल खुश हो जलाता रहा पुतला रावण का
राम सा ना बना पाया खुद को इंसान आज का