Monday, 29 September 2025

गज़ल 21

 

         


122    122    12 2   122


हवा चल रही फल  को बिखरा रहे हैं
गरीबों के बच्चों  को तरसा रहे हैं


दिया प्यार बेइंतहा जिन्दगी ने
उसी प्यार में खुद को बहका रहे हैं


परायी हूँ पर मान है दो घरों में
उसी मान से घर को महका रहे हैं


ठहर ही गए हैं  किसी रेत पर गम
जमीं पर नमी अब ये फिसला रहे हैं


कदम बढ़ चले तुझ से मिलने को नीलम
अना तेरी तुझको ही भटका रहे हैं


Saturday, 6 September 2025

हौसले

 






बहुत वेग से आता है पानी

 एक झटके में ही 

बहा कर ले जाता है सब कुछ 

पर कहां बहा कर ले जा पाता है 

इंसान के हौसले उसकी उम्मीदें 

जो कभी देखते हैं आसमान की ओर 

कभी देखते हैं  मदद के लिए

बढ़ रहे  मजबूत हाथों की  तरफ

जो भर देती है उनमें

 फिर से जीने का हौसला 

मजबूत कर देती है उनके कदम 

जैसे एक तीली माचिस से रगड़ खाकर  आग उत्पन्न करती है 

ऐसे ही एक कमजोर हाथ को 

जब मजबूत हाथ का सहारा मिलता है 

 तो वो मजबूत कदमों से 

पानी में से  

 सूखी जमीन पर कदम रखते हुए

हौसलों की उड़ान पर सवार हो

रब की मरजी को तरजीह दे

सपनों के बीज बोने लगता है 

फिर से नई उम्मीदों के साथ 

 

Tuesday, 2 September 2025

20 गज़ल

 



 ये दोस्ती रहेगी यही तय हुआ था
बिछड़ना नही अब यही तय हुआ था



दिखे रंग कोई भी हम खुश रहें गे
लियाक़त रखेंगे यही तय हुआ था

.युवाओं   नशा छोड़ दो साथ  हम हैं
दिखाना है जज्बा  यही तय हुआ था

फरिश्ता नहीं अब बनाना किसी को
मसीहा बनेंगे  यही तय हुआ था

भटकना  जरुरी है क्या राह से यूँ
नई राह खोजें यही तय हुआ था