ना में छिपी ना को ना कब समझोगे
बताओ मुझे इंसान कब समझोगे
खुद पीड़ा सहकर जन्म देती हूँ जिसे
मुझे उससे ताकतवर कब समझोगे
परेशानी में मेरे ही पहलू में बैठते हो
मुझसे कमजोर खुद को कब समझोगे
कमाकर बनाकर खिला सकती हूँ
घर चलाने वाली बताओ कब समझोगे
कमी निकालते हो मेरे कपड़ों में हरदम
खुद की नजरों को संभालना कब समझोगे
इज्ज़त औरत की ही क्यूँ उतरतीं है
उतारने वाले को गुनहगार कब समझोगे
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