Friday, 20 November 2020

याद आने लगे है

 याद आने लगे है 


नए सब्जबाग कयूँ दिखाने लगे हैं
छोड़ महबूब का घर वो आने लगे हैं

बागी हो उठे हैं तेवर देखकर उन्हें
कयूँ रोज नए नजराने लाने लगे हैं

हो जाऊँगी एक दिन मै उसकी
कयूँ मन अपना रोज भरमाने लगे हैं

दोस्ती प्यार में बदलती नहीं यूँ
बेवजह हक अपना जताने लगे हैं

माना सांझी यादें है कुछ बरसातों की
कयूं बातें पुरानी याद दिलाने लगे हैं

हर फासले तय किए है साथ साथ
किसलिए चाहत नई फरमाने लगे हैं

साथ रहने की हसरत पाल ली है
कयूँ ऐसे सपने मन में सजाने लगे हैं

जानते हो फर्क नहीं था तेरे मेरे बीच
अब कैसे बेवजह शान दिखाने लगे हैं

दरक गया जो रिश्ता वक्त ओ हालात से
दोबारा उसके फसाने कयूँ बनाने लगे हैं

खत्म हो गए थे एहसास जिसके लिए
बीते वक्त की बात कयूँ दोहराने लगे हैं


Friday, 13 November 2020

दिवाली

 दिवाली 

मैं एक कुम्हार
चाक पर करता जाँ न्योछार
मेरे सपने सजते जाते
जैसे जैसे मिट्टी ले आकार
मेरे घर भी मने दिवाली
आए मिठाई और फलाहार
चाक पर जल्दी हाथ चलते
ख़ुशियों का ना कोई पार
बिक जाए सारा सामान
भर जाए मेरे भी भंडार
मन मे सपने सजाए
करते जाए सारे कार
नीलम की भी है यही हसरत
इसकी सुने सब परिवार
मत करना इसको रुसवा
कर रही यही प्रार्थना बारमबार
दीए जलाओ ख़ुशियाँ मनाओ
चारों ओर लाओ नई बहार
सबके घर मने दिवाली
मन से दिए बनाए कुम्हार 

Friday, 6 November 2020

चुनाव

                                  चुनाव 


           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
मंजर से बदलने लगे हैं
कुछ लोग निखारने लगे हैं
सीधे मुँह बात ना करने वाले
सहानुभूति सी जताने लगे है
             चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
              लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
नए सब्जबाग दिखाने लगे हैं
पलकों पर सपने सजाने लगे हैं
गरीबों का हक मारने वाले
गरीबी हटाने की बात कराने लगे हैं
                         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                       लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं
खोलने लूट के खजाने लगे हैं
अपराध का ग्राफ बढ़ाने लगे हैं
शायद जीत मिल जाए ऐसे ही
होड़ में गुंडागर्दी दिखाने लगे हैं
                           चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं
                           लगता है फिर चुनाव करवाने लगे हैं 
बात करते हैं आधी आबादी के हक की 
टिकट माँगने पर आँखे दिखाने लगे हैं
ढहाते  हैं जुल्म औरतों पर गाहे बगाहे
अब आबरू बचाने की बात करवाने लगे हैं
         चेहरे पर नया नकाब लगाने लगे हैं 
         लगता है फिर चुनाव करवाने  लगे हैं