लाचार रहा होगा
ना हिन्दु ना मुसलमान रहा होगा
कितना अपमानित लाचार रहा होगा
बहाई होगी लाश जब गंगा में यूँ ही
याद तो हर रस्म दाह संस्कार रहा होगा
सोचा होगा दो गज जमीन के लिए
पास ना कोई दोस्त मददगार रहा होगा
कहाँ से इंतजाम करता लकड़ियों का
पास में पैसा ना रिश्तेदार रहा होगा
सब कुछ हो जाने के बाद बहाए दो आँसू
अपनी नाकामी पर छीछालेदर रहा होगा
कैसे लोग भूल पाएँगे पीड़ा दुख अपनो का
नीलम समझ खुद को खाकसार रहा होगा
बेवफा
जब भी दोस्त मिला बेवफा मिला
प्यार की जगह धोखा हर दफा मिला
जब भी चाहतों का जिक्र करना चाहा
कोरी किताब सा खाली हर सफा मिला
सुनाने जो निकले मन की बातें दूसरों को
सुनकर दास्तान हर शख्स ही खफा मिला
बाजार बना दाम लगा लेते है रिश्तों का
सोचते है कितना नुकसान या नफा मिला
कयूँ गायब है मुस्कान हर इक के चेहरे से
जिससे भी पूछा वह खुद से कफा मिला
गैरों की बात को तो जाने ही दो जानिब
जब भी मिला बस अपनों से ही जफा मिला
निकल पड़ा करो कभी ढ़ूढने पुराने दिनों को
यही वो जगह है जहाँ दोस्तों से शिफा मिला
होते है कुछ खुशनसीब लोग दुनिया में ऐसे
नीलम जिनको वफा के बदले वफा मिला
कफा __ पीड़ित
जफा ___ अत्याचार
सुखे गुलाब
साठ साल पार के
लोगों की किताबें
जब भी खंगाली जाएंगी
हर किताब में एक नई कहानी
दोहराई जाएगी
हर किताब से मिलेंगे कुछ सुखे फूल
कुछ पन्ने मिलेंगे कोनों से मुड़े हुए
शायरी के अंदाज में लिखे कुछ शब्द
जिन्हें देख उनके चेहरे खिल जाएँगे
हर फूल की अपनी दास्तान होगी
कुछ फूल तोड़े होंगे डाली से
माशूका को देने के लिए
अकेले वो मिली नहीं होगी
सामने देने की हिम्मत नहीं होगी
वो वापिस अपनी ही किताब में सहेजे होंगे
कुछ फूल माशूका तक पहुँचे होंगे
पर वो यादों तक ही सीमित होंगे
फूल रखा होगा किताब में
याद में चुपके से आँसू बहाए होंगे
किसी को याद में किताब के पन्नों को
बार बार बेतहाशा मोड़ा होगा
प्यार के इजहार के कुछ शब्द
लिखे होगें पन्नों पर
ना मिल पाने की मजबूरी भी
सिमट कर रह गई होगी शब्दों तक
कुछ शायर बन गए होगें
कुछ रह गए होंगे दीवाने बनकर