तेरी चाहतों का रहा कुछ असर ऐसा
तेज हवाएँ ढहा जाए कुछ कहर जैसा
साथ साथ समानांतर चलते रहे
अब आ गया जिंदगी में सहर कैसा
सिर्फ तुम्हें बनाया था राजदार अपना
राज खोल दिया तो रहा हमसफ़र कैसा
बच कर रह रही हूँ सबकी निगाहों से
घोल दिया मेरी जिंदगी में ये जहर कैसा
आग लगी झुलस गया तन मन सब
जैसे जले बदन गरमी की दोपहर जैसा
मार के पत्थर खलबली सी मचा दी
था कभी शांत खामोश सी नहर जैसा
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