शीर्षक : वजूद
कुछ सवाल घेरे रहते हैं मुझको
जब भी कोई पूछता है
मुझसे ही वजूद मेरा
हैरत में पड़ जाती हूँ
जब परिचय देते हुए बोलती हूँ
सिर्फ एक ही शब्द
इंसान सिर्फ इंसान
और अगला प्रश्न उछलता है
धर्म जात गोत्र कौन सी
किसकी बहु बेटी हो किसकी
हर बार उलझा जाता है ये प्रश्न मुझे
कभी कभी क्रोधित हो उठती हूँ
और कभी हँसी में टाल जाती हूँ
व्यथित हो उठती हूँ अक्सर
इस तरह के सवालों से
जो आंकते हैं कमतर
हर उस औरत को
जो ढूँढ रही है राह नई
बनाना चाहती है अस्तित्व
अपनी एक पहचान नई
पूछती हूँ मै आप सबसे
क्या जायज नहीं है मेरा व्यथित होना
इन सब बातों पर
No comments:
Post a Comment