किसीकी याद को तरस रहे हैं
जो यूँ ही बेतहाशा बरस रहे हैं
तेरे आने से मिले सुकून के लम्हे
तेरे बिन जाने कैसे झुलस रहे हैं
घुल जाती है कुछ कड़वाहट कभी
खुद को चाहे रखे कैसे सरस रहे हैं
महका रही है मिट्टी की सौधीं खुश्बू
इसके बिन तो जीवन नीरस रहे हैं
इस भीगे मौसम में आ जाओ साजन
अब तो लगता दुर्लभ तेरे दरस रहे हैं
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