गज़ल 15
122 122 122 12
1. खुदा तुझ से आती इनायत रही
हमेशा से फिर भी शिकायत रही
2.भटकते है इंसाफ को लोग अब
कहीं बिक हमारी सियासत रही
3.लगे फैसला करने जो न्याय का
नही उन में कोई लियाक़त रही
4.बहाता रहा जो पसीना बशर
मिली उस को फिर भी हिकारत रही
5 दिखाता रहा राह सपनों की जो
उसी बाप से ही खिलाफत रही
6 करे दान संपत्ति का 'नील' जो
उसी के ही हाथों नियामत रही

