Monday, 13 April 2026

उपेक्षित

      






 उपेक्षित 


अपने ही घर में 

कभी-कभी जब 

खुद को उपेक्षित सा महसूस करती हूँ 

तब मैं बातें करती हूँ 

उन कपड़ों से 

 उन बर्तनों से 

 सजाने के उस सामान  से 

और वो  मूक सामान गवाही देता है

 मेरी मेहनत की मेरे अरमानों की 

जिसे बहुत हसरत से 

और  बहुत ही मुश्किल से 

थोड़े-थोड़े पैसे जमा कर खरीदा था 

  इस तरह का सामान भी कभी-कभी 

 मुझ जैसी औरतों को भर देता है 

ना सिर्फ ऊर्जा से

 बल्कि  अपनत्व से भी

फिर लौट आती है 

चेहरे पे मुस्कान बरबस ही 

       

Friday, 10 April 2026

गज़ल 35







 122         122        122      122

नजारों से दिल ये  भटकने लगा है 

करूं क्या ये मन अब  बिदकने लगा है 


 हो सकता है मेरा वहम या हो धोखा 

वफ़ा भ्रम बन क्यों खटकने लगा है 


 है मुश्किल डगर सच की चलना तो है ही 

फरेबी   जहां से   सटकने लगा है 


महंगा पड़ा बोलना सच मुझे यूं 

दिया आस का अब चटकने लगा है 


सुनाई जो दास्तां दुखों की उसे अब 

   वो फिर पैर नीलम पटकने लगा है 

           

Wednesday, 8 April 2026

गज़ल 34

 










122         122        122      122


ये सूरज यूँ कुछ कुछ  बदलने लगा है 

तपिश से ही सहरा ये जलने लगा है 


बरस दर बरस साथ झेला बहुत दुख 

मुझे साथ अब क्यूं ये खलने लगा है 


कहानी बुढ़ापे के दिल की अलग है 

तुझे देख बच्चों सा खिलने लगा है 


जो शबनम जमी रह गई थी धरा पर 

वो मोती सा बन अब  पिघलने लगा है 


शहर लौट आएं हैं पंछी ये नीलम 

मेरा दिल खुशी से उछलने लगा है