Friday, 18 February 2022

नारी

    नारी


मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई  हूँ अपनी कीमत
अब है  आई मेरी बारी

अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी


ठगी गई  जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी  बनाया कंजक कुँआरी

बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की  हजार जिम्मेवारी

सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती  है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी 

Friday, 11 February 2022

माँ ने कहा

            माँ ने कहा


मैनें कहा माँ कहानी सुनकर
नींद अच्छी आती है
वो हँसती खुश होती
और  कहानी सुनाती पर
अनपढ़ माँ कहाँ से लाती नई कहानियाँ
जो उसने सुनी थी अपने बचपन में
अपनी  माँ नानी या  दादी से
सब तो सुना डाली
हर रोज नई कहानी की जिद से तंग
माँ ने कहा
किताबें पढ़ो
और रूबरू करवा दिया
उसने ज्ञान के उस अथाह सागर से
जो भरा हुआ था
अनगिनत किस्सों कथाओं से
अनसुनी अनकही दास्तानों से
डूब गई उसी में
मिल गया एक नया संसार
हर रोज एक नई कहानी
जब भी कोई नया किस्सा पढ़ती
सुनाती खुश होकर माँ को
एक दिन माँ ने जिद की
कुछ ऐसा सुनाओ जो कहीं नही लिखा
और सुनाने लगी मै कहानियाँ
सिर्फ माँ को  ही नही सबको
मेरी कहानी सुन सो गई माँ
एक लम्बी शाँत नींद में
कभी ना उठने के लिए 

Tuesday, 1 February 2022

खिड़की

 


        खिड़की
बेमकसद तो नही उठे थे कदम
हाँ बस  थोड़ी सी
बेख्याली  जरूर थी
बताना जरूरी भी नही समझा
और क्या बताता
बरबस ही उठ जाते है कदम
उस गली की ओर
खड़ा रहता हूँ
उस घर के आगे
घंटो निहारता हूँ
उस खिड़की को
जहाँ से दीदार होता था यार का
माना अब सन्नाटा पसरा रहता है
पर दिल को कहीं सुकून तो मिलता है
निभा रहा हूँ वफा
तेरी बेवफाई के बाद भी
मेरा वक्त मेरा प्यार
आज भी है बस
सिर्फ तेरे लिए