Friday, 18 February 2022

नारी

    नारी


मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई  हूँ अपनी कीमत
अब है  आई मेरी बारी

अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी


ठगी गई  जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी  बनाया कंजक कुँआरी

बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की  हजार जिम्मेवारी

सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती  है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी 

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