नारी
मै नारी
कभी थी आभावों की मारी
जान गई हूँ अपनी कीमत
अब है आई मेरी बारी
अब नहीं आती किसी की बातों में
कुछ मन की करती हूँ
सोचती हूँ अपने बारे में भी
नहीं बनती जरूरत से ज्यादा प्यारी
ठगी गई जो सदियों से
कभी देवी के नाम पर
कभी देवदासी के नाम पर
कभी बनाया कंजक कुँआरी
बना दिया गृहस्वामिनी घर की
बिना दिए कोई अधिकार
और खुश कर दिया
देकर घर की हजार जिम्मेवारी
सीख लिया है नारी ने भी जीना
कैसे खुद को रखना है खुश
समय निकाल लेती है अपने लिए
चाहे बने दासी या फिर अधिकारी
No comments:
Post a Comment