Wednesday, 29 December 2021

देह

       देह


एक स्त्री की देह से ही
पोषित सिंचित हुए तुम
रगो में लहु दौड़ा उसीका
देह से बाहर निकल
अस्तित्व बना तुम्हारा

लाड-प्यार दुलार दिखाकर
पहनना औढना सिखाकर
पढा लिखाकर
हुनर जीने का बताकर
गढ़ा चरित्र तुम्हारा

तेरे हिस्से का काम कर
तेरी नादानियों को छिपा
पोंछ तेरे आँसुओं को
खुशियों की राह दिखाकर
गढ़ दिया किरदार तुम्हारा

जब कभी  कदम रूके तेरे
लगा जीवन थम गया
आशा की नई किरण दिखाकर
निराशा के अंधेरों से  निकाल कर
संवार दिया जीवन तुम्हारा

साथ तेरे खड़ी रही हरदम
धड़कन तेरी बनी रही
भटकते कदमों को सही दिशा दिखाकर
नित उमंगों के दिए जलाकर
खुशियों से भर दिया दामन तुम्हारा
           






































Thursday, 16 December 2021

औरत

            औरत

इच्छाओं को मारकर कयूँ जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
देखकर खुला आसमान चहकती हूँ
उड़ना चाहती हूँ पंख फैला
फिर डर कर दुबक जाती हूँ
कभी शर्मसार हो रूक जाती हूँ
कभी सुन दुहाई समाज की झुक जाती हूँ
कभी बांध दी जाती हूँ बंधनों में
फड़फड़ाती हूँ कोशिश करती हूँ छूटने की
रिश्तों की दुहाई की आड़ में
कयूँ बंधनों में सिमटती जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
अकेले में चुपचाप रो लेती हूँ
बंधन को प्यार से ढो लेती हूँ
ख्वाबों की हसीं दुनिया बसा
अपने आप से ही खुश हो लेती हूँ
बच्चों को पालने की  जिम्मेदारी में
खुद को उसमें उलझा लेती हूँ
अपने अधूरे सपने
उनकी आँखों में सजा देती हूँ
निकल जाते हैं वो जब सपना पूरा करने
फिर से मन की बात दोहराती हूँ
कभी हँसी का पात्र बन जाती हूँ
कभी नई राह बना सब कुछ पाती हूँ
हर औरत ऐसे ही जीती है
जाने क्यूँ गमों को पीती है



















Tuesday, 30 November 2021

बेड़ियां

        

   
         शीर्षक-बेड़ियां

नहीं पहननी मुझको पायल
ये पायल  बेड़ियों सरीखी लगती है
जो रोक लेती है मुझे आगे बढने से
मत खरीदा करो मेरे लिए
ये लाल पीली  हरी चूड़ियाँ
ये उलझा देती है मुझे
जिन्दगी की रंगीनियों में
कुछ देना है तो दो हौसला
कर सकूँ हाथों का प्रयोग
हथियार की तरह
वक्त आने पर
भर दो मुझमें आत्मविश्वास
सामना कर सकूँ उन दरिंदों को
देखते है जो मुझे गंदी नजरों से
भर दो मेरी वाणी को ओज से
जवाब दे सकूँ उनकी गलत बातों का
जलाए रखना आशा का एक नया दीप
मेरे लिए हरदम
घिर जाऊँ जब कभी निराशापूर्ण भाव से
विश्वास मुझपर बनाए रखना
ना दाग लगने दूँगी पापा के नाम को
बस इतनी सी चाहत है मेरी
साथ देना मेरा तब भी तुम
जब  सारी दुनिया मेरे खिलाफ हो


Sunday, 14 November 2021

कयूँ किया प्यार

              कयूँ किया प्यार   

  
                          याद आए आज तुम बेशुमार
                           सोचती हूँ  कयूँ किया प्यार
याद आई बरसती बदलियाँ
फूलों पर डोलती तितलियाँ
कीचड़ में की जो अठखेलियाँ
याद आई  अबूझ पहेलियाँ
फिर आए याद वो वादे करार
                          याद आए आज तुम बेशुमार
                            सोचती हूँ कयूँ किया प्यार
याद करने को ढूँढ़ती तन्हाई
महसूस करती तेरी परछाई
आसमान में जब  बदली छाई
हरदम बस तेरी ही याद आई
फिर याद आई प्यार भरी तकरार
               याद  आए आज तुम बेशुमार
                  सोचती हूँ कयूँ किया प्यार






Tuesday, 9 November 2021

दवा बन जा

                   दवा बन जा


ले दर्द सारे किसी के लिए दवा बन जा
लेकर गम बस उसीका हमनवाँ बन जा

सुन किसी के दिल की बात शिद्दत से
प्यार से समझा  और राजदाँ बन जा

काम आ दूसरों के सोच गम की बात
देकर साथ सब  का खैरखवाह बन जा

सुन दुख किसी का बस हँसते है सब
समझ दर्द  किसी का और  दवा बन जा

मत सोच लोग क्या सोचते हैं कहते हैं क्या
कर अपने मन की और बेपरवाह बन जा

बाहर निकाल खुद को निराशा के घेरे से
जिन्दा रख बचपन और लापरवाह बन जा


हरदम मदद को हाथ बढाकर नीलम
कायम कर नई मिसाल और दास्ताँ बन जा 

Wednesday, 27 October 2021

करवाचौथ और दिखावा

                             करवाचौथ और दिखावा

देश के एक क्षेत्र विशेष की परम्परा करवाचौथ का व्रत बाजारवाद के कारण अन्य राज्यों में अपनी पैठ बिठा रहा है। अब ये उपवास कम उपहास का एक रूप बनता जा रहा है । औरतों में होड़ लगी हुई होती है कपड़े, श्रृंगार और गहनों को लेकर।  पति और सास ने क्या दिया या मायके से करवे पर क्या आया और कई बार इसी  बात को लेकर कई दिनों तक घर में तनाव का माहौल भी रहता है ।  माना परम्पराओं और संस्कृति को बनाए रखना और निभाना बहुत अच्छा है लेकिन उसकी आड़ में दिखावा कैसा । कल फेसबुक और वहटसअप देखते हुए मैनें उन औरतों की भी व्रत करते हुए की फोटो देखी जो कई सालों से पति से अलग रह रही है या जिन्होंने तलाक लिया हुआ है । कल से इसके पीछे का औचित्य ढूँढ रही हूँ। 
                      

Thursday, 21 October 2021

प्यार बाकी है

 


          प्यार बाकी है

मेरे दिल में तेरे हिस्से का प्यार बाकी है
आज भी करना तेरा इंतजार बाकी है

चाहतों पर कब किसका बस चला है
कुछ अधूरे वादे कुछ करार बाकी है

तुझे पाने के लिए बरसों भटकी दर बदर
चल आ चलें  अभी एक मजार बाकी है

जानती हूँ चाहत तो है तुम्हें भी है मुझसे
ये अलग बात है अभी इजहार बाकी है

ढूंढ़ ही लेते हो रास्ते मुझसे दूर रहने के
तुझे पास बुलाने के मौके हजार बाकी है

क्या खुशी से जी पाओगे मुझसे दूर रहकर
कयूँ नहीं कर लेते अभी जो इसरार बाकी है

कयूँ बेवजह की जिद ये कैसी तकरार बाकी है
हो ही जाओगे मेरे नीलम का एतबार बाकी है
                 









































Thursday, 7 October 2021

बेवजह

             बेवजह


जिन्दगी के दाग दिखाए नही जाते
कुछ राज सबको बताए नही जाते

मिल जाते है कुछ खुशनसीब ऐसे
जिनसे जख्म सारे छिपाए नही जाते

साथी तो बहुत है हाथ थामने वाले
सब  के लिए हाथ बढाए नही जाते

मजाक बना लेते है दिल की बात का
सबको अपने सपने सुनाए नहीं जाते

रुलाने के लिए  तैयार बैठा है हर कोई
सबके लिए तो  आँसू बहाए नहीं जाते

कभी तो बात कर मुझसे हकीकत की
सपनों के शहर में घर बसाए नहीं जाते

मुस्कुराने की फितरत को यूँ ही रख
बेवजह नीलम दिल जलाए नहीं जाते
                

Tuesday, 28 September 2021

उम्रभर

                      उम्रभर


तेरी मुस्कुराहट को देख मुस्कुराया उम्रभर
हर एक गम तुझसे ही मैनें छुपाया उम्रभर

ना चाहतें ही कम होने दी ना ही खुशियाँ
तेरी हर जुस्तजू को माथे से लगाया उम्रभर

सीने में दबा लिया हर राज रंज ओ गम को
अपने गम में भी चेहरा तेरा सहलाया उम्रभर

लोग सीढी बना तुझे खेलते रहे मेरे अरमानों से
झूठे जज्बातों का ये कैसा कहर ढाया उम्रभर

तेरे शौंक की खातिर रीति बीत गई जिन्दगी
फिर भी मुस्कुराने का हुनर ना गवाया उम्रभर

जिन्दगी की तरह तेरी मौत भी बनी मजाक
इसी एक कसक  ने नीलम मुझे रुलाया उम्रभर 






Monday, 20 September 2021

नेक काम

                                       नेक काम

रमा बहुत गरीब थी उसके दो बेटे थे करण और  अर्जुन । अभी करण 10 साल का था और  अर्जुन 9साल का था तभी से उसकी  माँ का सपना था कि अर्जुन और करण डाक्टर बने और गरीब लोगों का मुफ्त में इलाज करें ।   कुछ  साल  बाद तीनों की कड़ी मेहनत रंग लाई और वो दोनों डाक्टर बन गए । एक दिन   एक अमीर  बीमार बूढा जिसका नाम बलविंदर सिंह था उनके पास आया उसका आप्रेशन होना  था पर उसके बच्चे उसको बचाना  नही चाहते थे । उसके बेटे ने डाक्टर करण से कहा , " मेरे पिताजी बूढ़े हो गए है उनको मरना तो है ही उनके इलाज  पर पैसे लगाने से क्या फायदा । आप उन्हें जहर देदें जिससे वो आसानी से  मर जाए।  " करण ने कहा डाक्टर का काम जान बचाना होता है मै इन्हें  बचाने की हर संभव कोशिश करूँगा।  आप पैसा नही देना चाहते तो मत दें । मै इनका इलाज मुफ्त में कर दूँगा बस दवाईयों वगैरह पर जो खर्च हो वो दे देना । दरवाजे के पीछे खड़ा बूढ़ा व्यक्ति सारी बातें सुन रहा था ।
                                                     आप्रेशन के बाद बूढ़ा व्यक्ति ठीक हो गया और ठीक से चलने फिरने  लायक हो गया ।  दो तीन महीने बीतने पर एक वकील करण से मिलने आया उसने एक करोड़ का चैक पकड़ाते हुए कहा कि बलविंदर सिंह ने यह आपके लिए  भिजवाया है जिससे आप गरीब लोगों का मुफ्त इलाज कर सको । इसके अलावा अपना घर भी आपके नाम कर दिया है उनके  मरने के बाद आप वहाँ अस्पताल बनाना जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज कर अपनी माँ का सपना पूरा करना ।
                    
                                               



























Tuesday, 14 September 2021

लाडला

 जब झूले में था तब से लगा सपने दिखाने

लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
         कभी छुपता था पेड़ों के पीछे
         नन्हें पाँव से दौड़ता था छाँव में
         लुका छिपी खेलता था साथ मेरे
         मरहम लगा भरता था घाव मेरे
अब बड़ा हो लगा प्यार से समझाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
          देख तेरे चेहरे पर सेहरा सजा
          मिट गई मेरे जीवन की कजा
              प्यार से चूम लूँ माथा तेरा
         अब आए तुझे जीने का मजा
मेरी दुआओं से चला  नया संसार बसाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
         सच हो सपने तेरे सब सुहाने
        आग में तपकर हुआ है कुन्दन
         महके तेरा जीवन जैसे चंदन
        प्यार से महकता रहे ये बंधन
मन लगा तेरे लिए नित नए सपने सजाने
लाडला मेरा चला आज दुल्हन को लाने
 
      



















Wednesday, 1 September 2021

ईन दिनों

 जाने क्यूँ बहुत याद आने लगे हो इन दिनों

देखे थे ख्वाब साथ जो पुरे हो रहे इन दिनों

मसला मेरा स्वाभिमान से जीने का था बस
दिल को कचोट रहे है कुछ सवाल इन दिनों

तेरे जाने से छूट गए थे जो रंग जीवन में
फिर से  बस वही रंग भाने लगे है इन दिनों

छोड़कर मुस्कुराना सीख लिया था जीना
तुझ बिन भी महफिल भा रही है इन दिनों































Saturday, 21 August 2021

माँ बाप का घर

 ज्यादातर लड़कियों को घर में हिस्सेदार नही माना जाता । इसी विषय पर है मेरी कविता जिसका शीर्षक है  माँ बाप का घर लड़की अपने भाई से पूछ रही है

               माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
जिस घर में जन्मी मै
उस घर में जन्मे तुम
एक साथ पले बढे
एक साथ लड़े हम
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
        तुम खेले सड़कों पर
         मैनें घर को बुहारा
        माँ के बीमार होने पर
         रोटी के लिए मुझे पुकारा
                   फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
घर बनाने के लिए पत्थर ढोया
पानी के लिए नल मैनें चलाया
दुख सुख को एक साथ बिताया
अच्छा बुरा सब एक साथ निभाया
                     फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
कुछ  पैसे देकर तुझे आगे पढाया
मुझसे  माँ ने घर का काम कराया
आज तुझसे ज्यादा डिग्री पास मेरे
दुख में खुशी का अहसास कराया
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ

Thursday, 29 July 2021

बिन मेरे

            बिन मेरे

जब वो मेरे शहर में आए होगें
शाम के धुँधलके तब छाए होगें

डाल हाथों में हाथ घुमे  थे कभी
सुहाने मंजर तो वो याद आए होगें

हुक सी तो उठी ही होगी सीने में
जब बादल आसमाँ में छाए होगें

ढूँढ रहे होगें शहर की गलियों में
हर कहीं अक्स मेरे नजर आए होगें

मुहब्बत में ये कैसी बेबसी होती है
दिल की बात को ना बता पाए होगें

हँस हँसकर बातें की होगी सबसे
कैसे नम आँख के कोर छुपाए होंगे

बैठे होगें महफिल में साथ सबके
उनमें भी  आए नजर मेरे साए होगें

करवटें बदली होंगी रात  बिस्तर पर
क्या जख्म किसी को दिखाए होगें

अपने दर्द को दिल में ही दबाए होगें
नीलम जब वो मेरे शहर में आए होगें
          





Sunday, 18 July 2021

बिछड़ कर

               बिछड़ कर

उसके जाने के बाद पैगाम आने लगे
कयूँ यादों के साथ सलाम आने लगे

बिखर गए थे जो मोती कभी टूटकर
वो माला बनाने के काम आने लगे

छोड़ आए थे जिन्हें  किसी मोड़ पर
जुबां पर उनके ही नाम आने लगे

खुश हुए थे कभी जिनकी वजह से
याद वो किस्से पुराने तमाम आने लगे

रूक गई थी जो जिन्दगी किसी के लिए
रूकी सी जिन्दगी में नए मुकाम आने लगे

बीता दी उम्र जिसको तन्हाई में याद करके
उसके जाने पर इश्क के इल्जाम आने लगे

चाहा था  कभी जिसे दिल की गहराई से
गए तो पीर फकीर याद सब धाम आने लगे

कट रही है जिन्दगी पुरानी यादों के सहारे
नीलम बिछड़ कर जीने केअंजाम आने लगे




























Thursday, 8 July 2021

मजबूर हो गए

             मजबूर हो गए


तुझ से दूर होकर खुद से ही दूर हो गए
कयूँ अपनी चाहतों से ही मजबूर हो गए

ना तुझे बेवफा कह सके ना खुद को
वक्त के ढाए सितम से ही चूर हो गए

हर दम ही रहते थे जो नजरों के सामने
वो किसी ओर की आँख का नूर हो गए

बंद कमरे में हुई थी फक्त चंद मुलाकातें
जमाने में जाने कैसे किस्से मशहूर हो गए

नीलम तो आज भी सलामती चाहती है
क्या हुआ गर आज तुम मगरूर हो गए












Friday, 25 June 2021

नमी सी है

 होठों पर मुस्कान आँख में नमी सी है

सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी सी है
अनजान राह पर बनाने थे निशान
मंज़िल पाकर भी खिसकी जमीं सी है 

Sunday, 20 June 2021

पिता

 पितृदिवस पर विशेष


बचपन में
पिता का साया सिर से उठने से
ऐसा लगता है घर की
चारों दिवारों का ढह जाना
और छत में कई छेद हो जाना
उन छेदों को भरते भरते
निकल जाती है उम्र
फिर भी
एक शिकवा सा एक कसक सी
एक सूनापन सा
कभी ना भरने वाला खालीपन
तमाम उम्र पसरा ही रह जाता है
खुशियों के मौके पर भी
कभी मुस्कुराते हुए भी
अनचाहे अनजाने में भी
हो ही जाती है आँख नम

Tuesday, 15 June 2021

कोई तहखाना है

 


कोई तहखाना है

आए है खाली हाथ खाली हाथ जाना है
ना कफन की जेब ना कोई तहखाना है

फिर भी लूटने पर लगा दौलत दूसरों की
नहीं देना उनको जिन्हें पसीना बहाना है

बदकिस्मती साथ रहती है कुछ लोगों के
मेहनत पर भी  नहीं मिलता मेहनताना है

जी चुराते रहते है जो लोग काम से हमेशा
ना कोई रहम है उनपर ना तरस खाना है

जोड़ते है पाई पाई बच्चों को देने के लिए
खुद भूखे रहने की परम्परा को ढहाना है

खून चूस गरीबों का खड़े कर लेते है महल
किसलिए और क्या जमाने को दिखाना है

नहीं रह गई  है कीमत ईमानदारी की जग में
झूठ कहते है सब बेईमान का ही जमाना है

झूठी दौलत नहीं बस खुशियों की आस रखो
एक दूसरे की मदद की आदत को अपनाना है

छोड़ दो मोह दौलत का रास्ते भ्रष्टाचार के
ये ऐसी दौलत है जिसने सब गलत कराना है

ला सके तो लाओ मुस्कुराहट किसी के चेहरे पर
नीलम जग में आए है तो बस प्यार निभाना है










Monday, 7 June 2021

एक नया ख्याल

          एक नया ख्याल

एक कैंटीन पर कुछ पुरुष बैठे थे
जब किसी बात पर ठहाका लगाया
सुन उनकी बिंदास बातों ने
मेरा भी कुछ कुछ माथा ठनकाया
बैठे बैठे यूँ ही फिर एक ख्याल आया
और उस ख्याल पर जब गौर फरमाया
फिर मैनें भी एक कहकहा लगाया
खुश होकर ख्याल सहेलियों को सुनाया
सुन मेरी बात उन्होंने मुझे गले लगाया
मैनें भी अपने समय से थोड़ा समय चुराया
मनपसंद जगह पर एक ढाबा खुलवाया
उसे मनपसंद सुन्दर से रंगों से सजाया
ओनली फार लेडीज का बोर्ड लटकाया
इसमें आकर बैठना मनपसंद बातें करना
अपना भी हक है ये लेडिज  को समझाया
आओ जो तन्हा है मेरी ही तरह
या घर बैठे जिनका है मन उकताया
परेशान हो गई है घर की समस्याओं से
इस जगह को मायका समझने के लिए उकसाया
बात करो बीते बचपन की रीती जवानी की
बेरूखी पति की या जिसके प्यार ने तुम्हें रिझाया
सांझे करो दुख सुख खुशनुमा बातें जिन्दगी की
उन भाई बहनों  की जिनसे दिल से प्यार है पाया
नहीं मिलेगा यहाँ धोखा ना ही ताना देने वाला
नहीं मिलेंगे वो बाबा जिन्होनें झूठा स्वांग रचाया
आ जाओ हमें भी हक है खुश रहने का
आशीर्वाद दें हमें बड़ों ने यही समझाया
मेरा अनोखा प्रस्ताव सुन दिया समर्थन
मन ही मन मेरी सहेलियों का चित हरषाया
शंका है फलीभूत होगा या नहीं
पर नीलम के ख्याल पर सबका मन भरमाया



Monday, 24 May 2021

लाचार रहा होगा

              लाचार रहा होगा


ना हिन्दु ना मुसलमान रहा होगा
कितना अपमानित लाचार रहा होगा

बहाई होगी लाश जब गंगा में यूँ ही
याद तो हर रस्म दाह संस्कार रहा होगा

सोचा होगा दो गज जमीन के लिए
पास ना कोई दोस्त मददगार रहा होगा

कहाँ से इंतजाम करता लकड़ियों का
पास में पैसा ना रिश्तेदार रहा होगा

सब कुछ हो जाने के बाद बहाए दो आँसू
अपनी नाकामी पर छीछालेदर रहा होगा

कैसे लोग भूल पाएँगे पीड़ा दुख अपनो का
नीलम समझ खुद को खाकसार रहा होगा



















Tuesday, 11 May 2021

बेवफा

               बेवफा

जब  भी दोस्त मिला बेवफा मिला
प्यार की जगह धोखा हर दफा मिला

जब भी चाहतों का जिक्र करना चाहा
कोरी किताब सा खाली हर सफा मिला

सुनाने जो निकले मन की बातें दूसरों को
सुनकर दास्तान हर शख्स ही खफा मिला
     
बाजार बना  दाम लगा लेते है रिश्तों का      
सोचते है कितना नुकसान या नफा मिला       

कयूँ गायब है मुस्कान हर इक के चेहरे से     
जिससे भी पूछा वह खुद  से कफा मिला   

गैरों की बात को तो जाने ही दो जानिब
जब भी मिला बस अपनों से ही जफा मिला

निकल पड़ा करो कभी ढ़ूढने पुराने दिनों को
यही वो जगह है जहाँ दोस्तों से शिफा मिला          

होते है कुछ खुशनसीब  लोग दुनिया में ऐसे
नीलम जिनको  वफा के बदले वफा मिला
              कफा __ पीड़ित
              जफा ___ अत्याचार
              



             

Thursday, 6 May 2021

सुखे गुलाब

     सुखे गुलाब


साठ साल पार के
लोगों की किताबें
जब भी खंगाली जाएंगी
हर किताब में एक नई कहानी 
दोहराई जाएगी                                                                                
हर किताब से मिलेंगे कुछ सुखे फूल
कुछ पन्ने मिलेंगे कोनों से मुड़े हुए
शायरी के अंदाज में लिखे कुछ शब्द
जिन्हें देख  उनके चेहरे  खिल जाएँगे
हर  फूल की अपनी दास्तान होगी
कुछ फूल तोड़े होंगे डाली से
माशूका को देने के लिए
अकेले वो मिली नहीं होगी
सामने देने की हिम्मत नहीं होगी
वो वापिस अपनी ही किताब में सहेजे होंगे
कुछ फूल माशूका तक पहुँचे होंगे
पर वो यादों तक ही सीमित होंगे
फूल रखा होगा किताब में
याद में चुपके से आँसू बहाए होंगे
किसी को याद में किताब के पन्नों को
बार बार बेतहाशा मोड़ा होगा
प्यार के इजहार के कुछ शब्द
लिखे होगें पन्नों पर
ना मिल पाने की मजबूरी भी
सिमट कर रह गई होगी शब्दों तक
कुछ शायर बन गए होगें
कुछ रह गए होंगे दीवाने बनकर
         







Saturday, 24 April 2021

कहते कहते रह गए

 कहते कहते रह गए


बहुत कुछ कहते कहते रह गए
मेरे कुछ सपने हवा संग बह गए

जमी हुई थी बर्फ जो रिश्तों में
अनजान बन खामोशी से सह गए

कर रखा था कैद खुद को घर में
बेवजह यादों में ही खोए रह गए

सुनी आहट दिल ने तेरे आने की
लगा सब दर्रे दिवार ही ढह गए

बना लो अपना रहनुमा कोई ओर
किस सुकून से बड़ी बात कह गए

बरसों किया इंतजार जिस आहट का
आकर बता मजबूरियों की वजह गए

छोड़ बीच मझधार में जा रहे हो कहाँ
किसी के सहारे रहने को कयूँ कह गए

कया हुआ सुन दास्तान चाहत की मेरी
कयूँ अश्क तेरे भी बहते बहते रह गए

रजा और सजा जो चाहे मान लो
डाल असमंजस में नीलम को वह गए




Wednesday, 14 April 2021

खुशी के क्षण

 गूथंते हुए आटा

गूथं लेती हूँ
शब्दों को कविता के रूप में
कभी बुहारते हुए घर को
गंद के साथ साथ
नकारात्मक विचारों को भी
फेंक देती हूँ
बुनते हुए स्वेटर
फंदों के साथ साथ
बुन लेती हूँ कुछ ख्वाब
अपने लिए भी
काटते हुए सब्जियाँ
काट लेती हूँ
पाँव में पड़ी बेड़ियों को
सिलाई करते हुए
सिल लेती हूँ
वक्त के दिए जख्मों को
सच तो ये है
चुरा लेती हूँ खुशी के कुछ क्षण
कभी भी कहीं से भी 

Monday, 29 March 2021

कुछ लम्हे खुशी के

 कुछ लम्हे खुशी के 


रूठ कर यूँ ना जाया कीजिए 

कभी प्यार से मनाया कीजिए 


जिन्दगी के कैसे रूप है नित नए 

कभी धूप तो कभी छाया कीजिए 


कुछ लम्हों की बची है जिन्दगी 

यूँ ना बहस में इसे गवाया कीजिए 


दूसरों के चेहरे पर देख सुकून 

अपने मन को ना जलाया कीजिए 


दूसरों के चेहरे पर मुस्कान ला 

खुद के दिल में सुकून पाया कीजिए 


गुजार लो कुछ लम्हें खुशी के भी 

बैठ दोस्तों के साथ खाया कीजिए 


बहुत ही खूबसूरत प्यारी है जिंदगी 

गैर जरूरी बातों में ना जाया कीजिए 


बहुत ही हसीन एहसास है ये प्यार का 

इस एहसास को सीने से लगाया कीजिए 


जरूरत नहीं होती शब्दों मे कहने की 

ज़बां से नहीं आंखों से ही बताया कीजिए 


अपने ही है सब आस पास चाहने वाले 

नीलम यूँ ना किसी को पराया कीजिए 


Saturday, 20 March 2021

निभाओगी कैसे

 निभाओगी कैसे


मोहब्बत है मुझसे ये बताओगी कैसे
मिलोगी जब मुझसे जताओगी कैसे

चेहरा तो छुपा लोगी मास्क से
आँखों की चमक छुपाओगी कैसे

इस तरह डरोगी जमाने से तो
फिर मोहब्बत को निभाओगी कैसे

जंग है ये तो अब लड़नी ही पड़ेगी
हार कर खुद को जिताओगी कैसे

परम्पराओं को बेड़ियाँ समझोगी तो
काटने का हौसला इन्हें लाओगी कैसे

चल पड़ी हो जो साथ मेरे बन हमदम
बीच राह में छोड़ मुझे जाओगी कैसे

यूँ हारकर छोड़ हौसला बैठ जाओगी तो
जमाने को अपनी दास्तान सुनाओगी कैसे

कुचल दोगी हसीन एहसास को यूँ ही तो
प्यार की इस क्यारी को खिलाओगी कैसे

कैसे करते है प्यार खुद को खुद से ही
नीलम ये ज़माने को दिखाओगी कैसे










Saturday, 6 March 2021

हाले दिल सुनाने आएँगे

हाले-दिल सुनाने आयेंगे सुन फ़रियाद ख्वाब सुहाने आएंगें साथ कभी हमारे भी ज़माने आएंगें कब से रूठ कर बैठे है उनसे इंतजार है वो कब मनाने आएंगें प्यार की राह है हर राह से जुदा दिल से दिल की राह बताने आयेंगें प्यार क्या है कब कैसे होता है कोई पूछे तो कैसे समझाने आयेंगें रूठना भी एक अदा है प्यार की इश्क ऐसे ही तुझ से जताने आयेंगें ऐसे ही रहना दिल के करीब सदा फिर कभी हाले दिल सुनाने आयेंगें साथ गुजारे थे फुर्सत के दिन जो मिल बैठ फिर याद दिलाने आयेंगें क्या हुआ जो आज है तन्हाई में संग तुम्हारे महफ़िल सजाने आयेंगें ठहर गयी है जो कश्ती जीवन की चीर लहरों को पार लगाने आयेंगें क्यूँ थामा है दामन उदासी का कभी तो नीलम दिन पुराने आयेंगें

Wednesday, 10 February 2021

याद नही करते

याद नहीं करते 

 कसकते से उन लम्हों को याद नहीं करते 
फिर ना मिलने की भी फरियाद नहीं करते 

 जानती हूँ माहिर हो शब्दों की जादूगरी में 
 वो प्यार भरे शब्द भी अब शाद नही करते 

 गुमनाम हो जाते है जो वक्त की आँधी में 
 पुकारने पर फिर वो कोई नाद नही करते 

 एक बार चले जो गए मझधार में छोड़कर 
 मनाने की कोशिश पर भी दाद नही करते

 छोड़ दिया है बीते वक्त को सपने की तरह
 छूटी हुई गलियों पर फिर नासाद नहीं करते 

 समय का चक्र जैसे भी बीता बीत गया 
वक्त बीते हुए वक्त पर यूँ वक्त बरबाद नहीं करते 

 मिल रही है थाह वक्त की मजबूरियों की 
 पर अब बीते वक्त पर कभी वाद नही करते

Monday, 1 February 2021

लाचार किया है

 लाचार किया है


कब मैंने अपनी चाहतों का इजहार किया है
फिर क्यूँ तुमने रुसवा सरे बाजार किया है

जुदा कर ली थी राहें अपनी बरसों पहले
फिर किस रिश्ते से अपना हकदार किया है

आरजू तो कभी रखी ही नहीं थी फूलों की
फिर तेरे लिए क्यूँ जिन्दगी को खार किया है

प्यार एक अहसास है जो दिल से बाबसतां है
कब किसने इसे जबरदस्ती स्वीकार किया है

माना तुमने इजहार कर दिया मोहब्बत का
जरूरी तो नहीं मैनें तुझसे ही प्यार किया है

दफन रहने दो सीने में इस इकतरफा प्यार को
कयूँ मानने पर इसे इतना मुझे लाचार किया है

जी लो दो दिन हँसी खुशी से जो मिला है
अपने लिए कयूँ दूसरों को खाकसार किया है

कुछ हासिल नहीं होगा झूठी हमदर्दी से
नीलम किसलिए इज्जत को तार तार किया 

Monday, 11 January 2021

खामोश सदाएँ

 खामोश सदाएँ 


बारहा आती हुई खामोश सदाओं को
यूँ कभी सबके साथ जताया नहीं करते

सीखा है खुश रहना हर हाल जिन्दगी में
अपनी परेशानियां यूँ बताया नहीं करते

क्या हुआ गम है तन्हाई है पीड़ा है
रब की नेमत को ठुकराया नहीं करते

जी लो बसा कर मीठी यादों को दिल में
वक्त ने जो दिया है उसे गवाया नहीं करते

जब चल ही पड़े है अंजान राहों पर
राह की मुश्किलों से यूँ घबराया नहीं करते

राह पर मिलेंगे लोग तुम पर हँसने वाले
डर से पगडंडी को रास्ता बनाया नहीं करते

यकीन रख खुद की हाथों की लकीरों पर
मेहनत छोड़ किस्मत को आज़माया नहीं करते

कदर नहीं जिनको आपकी उनके लिए
अपने हुनर को दाँव पर लगाया नहीं करते

खोने को कुछ नहीं चंद बेड़ियों के सिवा
वक्त अपना यूँ दूसरों पर जाया नहीं करते

उठ चल आगे बढ़ मंजिल को पाने के लिए
दूसरों की बातों में नीलम यूँ आया नहीं करते