उपेक्षित
अपने ही घर में
कभी-कभी जब
खुद को उपेक्षित सा महसूस करती हूँ
तब मैं बातें करती हूँ
उन कपड़ों से
उन बर्तनों से
सजाने के उस सामान से
और वो मूक सामान गवाही देता है
मेरी मेहनत की मेरे अरमानों की
जिसे बहुत हसरत से
और बहुत ही मुश्किल से
थोड़े-थोड़े पैसे जमा कर खरीदा था
इस तरह का सामान भी कभी-कभी
मुझ जैसी औरतों को भर देता है
ना सिर्फ ऊर्जा से
बल्कि अपनत्व से भी
फिर लौट आती है
चेहरे पे मुस्कान बरबस ही







