Saturday, 9 July 2022

गिले शिकवे

 गिले शिकवे

क्या दिन थे जब हम मिले थे

लगा हर जगह फूल खिले थे


बरसों रहा तेरा मेरा याराना

बरसों चले यही सिलसिले थे


याद है तुझे पाने का वो जनून

जाने कितने फतह किए किले थे 


खुश थे एक साथ रहकर हम 

चाहे एक दूसरे से बहुत गिले थे


कांटों की चुभन महसूस ना हो

खूबसूरती से ही लब सिले थे 


खार चुभ रहें हैं आज तो क्या

तेरी यादों  से ही जख्म छिले थे


धोखा दिया वक़्त ने ये कैसा

कभी तो हजारों रंग खिले थे

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