मुस्कान
बहुत दिनों से छाया हुआ था कुहासा
घेरे हुए थी उदासियाँ
फैलता जा रहा था अँधेरा
मन के हर कोने में घर बना लिया था
एकाकीपन और निराशा ने
इन सब से ऊब कर चली आई
फिर से ढूँढने खुद को
स्मृतियों के बागान में
याद किए बचपन के वो दिन
जब खेलती थी मस्ती में
अँधेरा होने तलक बिना किसी फिक्र के
याद किए जवानी के वो दिन
जब बेवजह खिलखिलाती थी घंटो
मेरी उस निश्छल हँसी को देखकर
मुस्कुरा उठते थे वो चेहरे भी
जिनपर छाई रहती थी उदासी महीनों
याद किए वो दिन भी
जब बच्चों की मोहिनी मुस्कान से
मुस्कुरा उठी थी भूलकर सब रंजो गम
सालों से ये मुस्कान ही मेरी पहचान है
फिर क्यूँ कर रही हूँ कैद अब खुद को
कयूँ ओढ़े हूँ लबादा जिम्मेदारी का
सोचते ही छँट गए बादल निराशा के
फिर करीने से संवारे सफेद बाल
फिर झुर्रीदार चेहरे पर आई मुस्कान