मेरा घर
सारी उम्र की कमाई को खर्च कर डाला
पाई पाई जोड़कर मोहताज कर डाला
खून पसीना बहाकर जोड़ा था जो पैसा
उससे उम्मीदों का महल खरा कर डाला
जगह जगह से इक्कठे किए सुन्दर फूल
पेड़ पौधे लगा घास उगा बगीचा बना डाला
सोचा था मिलेंगे जब फुर्सत के कुछ क्षण
मस्ती के पलों के लिए जुगाड़ बना डाला
जब मिली फुर्सत और बैठने का समय मिला
तब बच्चों ने अलग अपना घरौंदा बना डाला
ऐसे समय साथी भी साथ छोड़ चल बसा
निराशा छा गयी विक्षिप्त सा जीवन बना डाला
महीनों बीता दिए खुद से समझोते करते हुए
चाय से इश्क जता खुद को आशिक बना डाला
अब मैं हूँ मेरा इश्क है और मेरी तन्हाई है
मोबाइल ले हाथ में खुद से प्यार कर डाला
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