पितृदिवस पर विशेष
बचपन में
पिता का साया सिर से उठने से
ऐसा लगता है घर की
चारों दिवारों का ढह जाना
और छत में कई छेद हो जाना
उन छेदों को भरते भरते
निकल जाती है उम्र
फिर भी
एक शिकवा सा एक कसक सी
एक सूनापन सा
कभी ना भरने वाला खालीपन
तमाम उम्र पसरा ही रह जाता है
खुशियों के मौके पर भी
कभी मुस्कुराते हुए भी
अनचाहे अनजाने में भी
हो ही जाती है आँख नम
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