कहते कहते रह गए
बहुत कुछ कहते कहते रह गए
मेरे कुछ सपने हवा संग बह गए
जमी हुई थी बर्फ जो रिश्तों में
अनजान बन खामोशी से सह गए
कर रखा था कैद खुद को घर में
बेवजह यादों में ही खोए रह गए
सुनी आहट दिल ने तेरे आने की
लगा सब दर्रे दिवार ही ढह गए
बना लो अपना रहनुमा कोई ओर
किस सुकून से बड़ी बात कह गए
बरसों किया इंतजार जिस आहट का
आकर बता मजबूरियों की वजह गए
छोड़ बीच मझधार में जा रहे हो कहाँ
किसी के सहारे रहने को कयूँ कह गए
कया हुआ सुन दास्तान चाहत की मेरी
कयूँ अश्क तेरे भी बहते बहते रह गए
रजा और सजा जो चाहे मान लो
डाल असमंजस में नीलम को वह गए
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