लाचार रहा होगा
ना हिन्दु ना मुसलमान रहा होगा
कितना अपमानित लाचार रहा होगा
बहाई होगी लाश जब गंगा में यूँ ही
याद तो हर रस्म दाह संस्कार रहा होगा
सोचा होगा दो गज जमीन के लिए
पास ना कोई दोस्त मददगार रहा होगा
कहाँ से इंतजाम करता लकड़ियों का
पास में पैसा ना रिश्तेदार रहा होगा
सब कुछ हो जाने के बाद बहाए दो आँसू
अपनी नाकामी पर छीछालेदर रहा होगा
कैसे लोग भूल पाएँगे पीड़ा दुख अपनो का
नीलम समझ खुद को खाकसार रहा होगा
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