औरत
इच्छाओं को मारकर कयूँ जीती हूँना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
देखकर खुला आसमान चहकती हूँ
उड़ना चाहती हूँ पंख फैला
फिर डर कर दुबक जाती हूँ
कभी शर्मसार हो रूक जाती हूँ
कभी सुन दुहाई समाज की झुक जाती हूँ
कभी बांध दी जाती हूँ बंधनों में
फड़फड़ाती हूँ कोशिश करती हूँ छूटने की
रिश्तों की दुहाई की आड़ में
कयूँ बंधनों में सिमटती जीती हूँ
ना जाने क्यूँ गमों को पीती हूँ
अकेले में चुपचाप रो लेती हूँ
बंधन को प्यार से ढो लेती हूँ
ख्वाबों की हसीं दुनिया बसा
अपने आप से ही खुश हो लेती हूँ
बच्चों को पालने की जिम्मेदारी में
खुद को उसमें उलझा लेती हूँ
अपने अधूरे सपने
उनकी आँखों में सजा देती हूँ
निकल जाते हैं वो जब सपना पूरा करने
फिर से मन की बात दोहराती हूँ
कभी हँसी का पात्र बन जाती हूँ
कभी नई राह बना सब कुछ पाती हूँ
हर औरत ऐसे ही जीती है
जाने क्यूँ गमों को पीती है
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