गूथंते हुए आटा
गूथं लेती हूँशब्दों को कविता के रूप में
कभी बुहारते हुए घर को
गंद के साथ साथ
नकारात्मक विचारों को भी
फेंक देती हूँ
बुनते हुए स्वेटर
फंदों के साथ साथ
बुन लेती हूँ कुछ ख्वाब
अपने लिए भी
काटते हुए सब्जियाँ
काट लेती हूँ
पाँव में पड़ी बेड़ियों को
सिलाई करते हुए
सिल लेती हूँ
वक्त के दिए जख्मों को
सच तो ये है
चुरा लेती हूँ खुशी के कुछ क्षण
कभी भी कहीं से भी
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