Wednesday, 14 April 2021

खुशी के क्षण

 गूथंते हुए आटा

गूथं लेती हूँ
शब्दों को कविता के रूप में
कभी बुहारते हुए घर को
गंद के साथ साथ
नकारात्मक विचारों को भी
फेंक देती हूँ
बुनते हुए स्वेटर
फंदों के साथ साथ
बुन लेती हूँ कुछ ख्वाब
अपने लिए भी
काटते हुए सब्जियाँ
काट लेती हूँ
पाँव में पड़ी बेड़ियों को
सिलाई करते हुए
सिल लेती हूँ
वक्त के दिए जख्मों को
सच तो ये है
चुरा लेती हूँ खुशी के कुछ क्षण
कभी भी कहीं से भी 

No comments:

Post a Comment