जीने की कला
21वी सदी का दौर या यूँ कहे
कि आज का दौर पिछली सभी सदियों से भयानक और डराने वाला है आज तक ऐसी कोई महामारी
नहीं आई जिसने एक साथ सारे विश्व को अपनी
चपेट में ले लिया हो |
अलग अलग समय पर अलग अलग
क्षेत्रों में महामारियां फैलती रही है परन्तु इस तरह की स्थिति कभी भी आई जब सब
कुछ एक साथ लॉक डाउन हो गया हो और लोगों के मन में इस तरह की दहशत घर कर गयी हो |
लेकिन जैसा कि कहा जाता है
अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो वह आने वाले उजाले की किरण को रोकने में असमर्थ
होता है | एक टिमटिमाते दिए की रौशनी और आशावादी सोच गहन से गहन तिमिर को भी फैलने
से रोक देती है और कहीं न कहीं हमें उजाले की ओर अग्रसर कर देती है | आज का दौर
इसका जीता जागता उदहारण है |
प्रकृति को ले या मानवीय
संवेदनाओं की बात करे तो आज का समय अपनी उत्कृष्टता में अव्वल दर्जे पर है | लोग
भयभीत जरुर है परन्तु उनकी कर्तव्यपरायणता ने परकाष्ठा की सारी सीमाएं लांघ दी है
डॉक्टर , पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी अपने कर्तव्यपथ पर चलते हुए प्रत्यक्ष रूप
से दिखाई दे रहे है , लोग भी उनको सम्मानित कर रहे है , उनपर फूल बरसा रही है और
दिल से उन्हें दुआएं दे रहे हैं |
इसके अलावा बहुत से ऐसे लोग है जो अन्य बहुत से कामों में
लगे हुए है |कुछ लोग गरीबों को खाना पहुंचा रहे है , कुछ दवाइयां पहुंचा रहे है , कुछ
मरीजों की सेवा कर रहे है , कुछ मरीजों के परिजनों की देखभाल कर रहे है | बहुत से
लोग घर बैठे खाना बनाने का काम कर रहे है | जिसकी जैसी सोच है या जिसका जितना
सामर्थ्य है हर कोई समाज के लिए कुछ न कुछ कर रहा है|
इस मुश्किल की घडी को सहज और सरल बनाने में
महिलाओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिन्होंने पति और बच्चों को
घरों से जोड़े रखा | उनके खाने पीने का
ध्यान रखा और लगभग हर तरह का व्यंजन घर में बना कर खिलाने की कोशिश की | सारा दिन
अपने आपको मुस्कुराते हुए घर के कामों में व्यस्त रखा |
बहुत से लोग तो ये भी
मानते है कि वो अपने काम में और पैसा कमाने में इतने व्यस्त हो गए थे कि जिंदगी का
असली स्वाद भूल ही गए थे | उन्होंने इस
समय को भगवान् की तरफ से दिये गए वरदान की तरह माना और अपनी छिपी हुई प्रतिभा को
निखारने में लगा दिया |
बहुत से लोग निराश भी हुए है
लेकिन आशावादी लोगो की संख्या ज्यादा है | वक़्त बुरा है इसका मतलब ये भी नहीं कि
हम सारा समय रोने में ही बिता दें हमें ये सोचना होगा कि ऐसे समय में हम समाज को
क्या दे सकते हैं और समाज में रहने वाले लोगों का साथ किस तरीके से दे सकते है |
माना दौर बुरा है पर डरावना
नहीं है
सीखाना है मुस्कुराना रोना नहीं
है
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