Sunday, 27 September 2020

बेटी जैसा

 बेटी जैसा 

मुझेभी अब समझ आया
जब क्षीण हो गयी काया
अकेलेपन में विदा की हुई
बेटी का हँसता चेहरा नजर आया
हाय रे
सब बेटी को ही कयूं बतलाया
बेटे को क्यु ना कुछ समझाया
क्यु ना डाली घर की जिम्मेदारी
क्यु ना घर का काम सिखाया
जब घर दो लोगों का है
तब दोनों को क्यु ना बराबर समझाया
बचपन में जो था पढाना
ज़वानी में भी ना पढाया
खुशियों में ना साथ हँसाया
दुखों में ना पास बैठ रुलाया
जब बेटी को बेटे जैसे पाला
निर्भीक बना भेजा बाहर
अपनी रक्षा को सक्षम बनाया
तो क्यु ना बेटे को बेटी जैसे बनाया
रोटी बनाना कपड़े धोना सिखाया
चूक हुई मुझसे ही कहीं
अब बेटे को ही क्यु दोषी ठहराया
एहसास तो गलती का उसे भी है
ऐंठ में गलती मानना भी कहां भाया
अब भी वक़्त है संभल जाओ ए माओं
बेटे को कुछ कुछ बेटी जैसा बनाओ
नीलम नारंग 

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