बूँद
जब भी भर जाती हो गुब्बार से
दब जाती हो अपने ही बोझ से
बरस के खुद को हल्का कर लेती हो
गिर के धरती पर बन दूसरे की ख़ुशी
बन पानी समा जाती हो धरती में
बन बूँद कभी खुद को सीप कर लेती हो
पैदा कर देती हो चमक आँखों में
लहलहाती फसल देखकर
बन बूँद किसान को खुश कर लेती हो
देखकर तुझे हर्ष उठता है प्रेमी
साहस मिलता है प्रणय निवेदन का
बन ख़ुशी प्रेमी की आँखें नाम कर लेती हो
बुंद प्रेरणा देती है ख़ुशियों की, त्याग की। बहुत अछे से बयान किया है।
ReplyDeletethanks for motivating comment
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