Tuesday, 14 July 2020

बूँद



                             बूँद
      जब भी भर जाती हो गुब्बार से
      दब जाती हो अपने ही बोझ से
      बरस के खुद को हल्का कर लेती हो

     गिर के धरती पर बन दूसरे की ख़ुशी
     बन पानी समा जाती हो धरती में
     बन बूँद कभी खुद को सीप कर लेती हो 

     पैदा कर देती हो चमक आँखों में
    लहलहाती फसल देखकर
    बन बूँद किसान को खुश कर लेती हो

     देखकर तुझे हर्ष उठता है प्रेमी
     साहस मिलता है प्रणय निवेदन का
    बन ख़ुशी प्रेमी की आँखें नाम कर लेती हो  

2 comments:

  1. बुंद प्रेरणा देती है ख़ुशियों की, त्याग की। बहुत अछे से बयान किया है।

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