Wednesday, 7 October 2020

कसक बाकी है

 कसक बाकी है 


उन उजले चंद लमहों की कसक बाकी है
आज भी तुझसे मिलने की ललक बाकी है

पहला फूल जो दिया पयार के इजहार में
आज भी सांसों में उसकी महक बाकी है

मिश्री से शब्द जो बोले थे कानों में कभी
आज भी कान में बोल की खनक बाकी है

डाल हाथों में हाथ चले थे जब साथ साथ
लड़खड़ाते से उन कदमों की चहक बाकी है

संजोए थे जो सपने हमनें सुनहरी शाम के
तेरी याद के सहारे छूना वो फलक बाकी है

नाराजगी जो कभी जाहिर की प्यार से
अलग अंदाज से मनाने की सनक बाकी है


मुझे देखकर आ जाती थी तेरे चेहरे पर रौनक
दिल में बसी वो तेरे चेहरे की झलक बाकी है


रूठ कर चले गए जो मझधार में छोड़कर
आज भी नीलम की नम हुई पलक बाकी है








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