Wednesday, 26 October 2022

जीने का बहाना

        जीने का बहाना


जाते हुए जीने का बहाना दे गया
दोस्त अपना  प्यारा पुराना दे गया

राज़दार  रहा था जो हम दोनों का
दोस्ती का  वो भरपूर खजाना दे गया

नहीं तो बहते ही रहते आँख से आँसू
लबों पर हँसी का ऐसा  बहाना दे गया

जात पात से ऊपर ही रखना दोस्ती को
लोगों को परखने का अलग पैमाना दे गया

वैसे ही किस्सों में  चल रही थी जिन्दगी
एक नई कहानी नया अफ़साना दे गया

बहुत  से अनमोल तोहफे दिए तुमने
दोस्ती के नाम पर ये कैसा नज़राना दे गया

भूलकर मुझे नई दुनिया बसा लि तुमने तो
जाते हुए मुझे रहने का ठिकाना दे गया 

Saturday, 22 October 2022

बादल

 


किसीकी याद को तरस रहे हैं

जो यूँ  ही बेतहाशा बरस रहे हैं


तेरे आने से मिले सुकून के लम्हे

तेरे बिन जाने कैसे झुलस रहे हैं


घुल जाती है कुछ कड़वाहट कभी

खुद को चाहे रखे कैसे सरस रहे हैं


महका रही है मिट्टी की सौधीं खुश्बू

इसके बिन तो जीवन नीरस रहे हैं


इस भीगे मौसम में आ जाओ साजन

अब तो लगता दुर्लभ तेरे दरस रहे हैं

          



Friday, 21 October 2022

ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ

 ਸਲਾਮ ਕਰ ਦੀ ਹਾਂ ਮੈ

ਪੰਜਾਬ ਦੀ ੳਸ ਮਾਂ ਭੈਣ ਤੇ ਧੀ ਨੂ
ਜਿਸ ਮਾਂ ਨੇ ਜਮਆ ਸੂਰਮਾ ਪੂਤ
ਜਿਨੂ ਘੋੜੀ ਚਢਾਣ ਦੇ ਖਾਬ ਦੇਖੇ
ਛੱਡ ਘੋੜੀ ਔ ਚਢ ਗਿਆ ਫ਼ਾਂਸੀ
ਨਾਲ ਕਸਮ ਦੇ ਗਿਆ ਹੰਝੂ ਨਾ ਵਹਾਇ
ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ ਹੈ ਸਿਰ ਨੀਵਾਂ ਨਾ ਪਾਈ
ਸੌਚ ਰਹੀ ਮਾਂ ਨਿਮਾਨੀ
ਹੰਝੂ ਜਥਰ ਕਿਵੇਂ ਕਰਾ
ਮਾਂ ਤਾਂ ਮਾਂ ਹੁੰਦੀ ਹੈ
ਏ ਦੁਖੜਾ ਮਾਂ ਕਿਵੇਂ ਜਰੇ
ਦਸੇ ਤਾਂ ਕਿਨੂ ਕਿ ਕਹੇ
ਹੁਣ ਵੀ ਮਾਂਵਾਂ ਪੂਤ ਤਾਂ ਮੰਗਦਿਆਂ ਨੇ
ਡਗਤ ਸਿੰਘ ਸਰੀਖੇ
ਪਰ ਅਪਨੀ ਕੂਖ ਤੌ ਨਹੀਂ
ਦੂਜੇ ਦੀ ਕੂਖ ਤੌ ਜਮਾਈ
ਔ ਬੌਗੇ ਨੂੰ ਬੇਬੇ ਬਨਾ ਗਿਆ
ਆਵਦੇ ਜਨੀ ਭੇਦ ਸਾਰੇ ਮਿਟਾ ਗਿਆ
ਕਿ ਔਸ ਡੈਣ ਦੀ ਗੱਲ ਸੂਨਾਵਾਂ
ਰੱਖੜੀ ਦਾ ਮੂਲ ਚੱਕਾ ਗਿਆ
ਉਸਦੀ ਰਖਿਆ ਕਰਨ ਵਾਸਤੇ
ਲੜ ਬੈਠਾ ਕਿਨੇ  ਹੀ ਆਤਤਾਇਯਾਂ ਨਾਲ
ਸਲਾਹੁਦੀ ਨ੍ਹੀ ਥੱਕਦੀ ੳਸ ਧੀ ਨੂ
ਕਾਟਤੀ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ੳਦੇਂ ਨਾਮ ਤੇ
ਜਿਹਦੇ ਲਾੜ ਨਾਲ ਲਾਣ ਦਾ ਪਿਓ ਨੇ
ਕੀਤਾ ਸੀ ਵਿਚਾਰ ਕਦੇ
ਕਿਨਾ ਫਰਕ ਹੈ ੳਸ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਤੇ ਆਜ ਦਿ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਆਜ ਦਾ ਨੌਜਵਾਨ ਜਿਨ੍ਹੇ ਅਪਣੇ ਆਪ ਨੂ
ਗੁਲਾਮ ਬਣਾ ਲਿਆ ਹੈ ਨਸ਼ੇਆ ਦਾ
ਕਿਵੇਂ ਸਮਝ ਸਕੇਗਾ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂ











Wednesday, 19 October 2022

असर ऐसा

 तेरी चाहतों का रहा कुछ असर ऐसा

तेज हवाएँ ढहा जाए कुछ कहर जैसा


साथ साथ समानांतर चलते रहे

 अब आ गया जिंदगी में सहर कैसा


 सिर्फ तुम्हें बनाया था राजदार अपना 

राज खोल दिया तो रहा हमसफ़र कैसा  


बच कर रह रही हूँ सबकी निगाहों से

घोल दिया मेरी जिंदगी में ये जहर कैसा


आग लगी झुलस गया तन मन सब 

जैसे जले बदन गरमी की दोपहर जैसा


मार के पत्थर खलबली सी मचा दी 

था कभी शांत खामोश सी नहर जैसा






Friday, 14 October 2022

मेरा घर

            मेरा घर


सारी उम्र की कमाई को खर्च कर डाला
पाई पाई जोड़कर  मोहताज कर डाला

खून पसीना बहाकर जोड़ा था जो पैसा
उससे उम्मीदों का महल खरा कर डाला

जगह जगह से इक्कठे किए  सुन्दर फूल
पेड़ पौधे लगा घास उगा बगीचा बना डाला

सोचा था मिलेंगे जब फुर्सत के कुछ क्षण
मस्ती के पलों के लिए जुगाड़ बना डाला

जब मिली फुर्सत और बैठने का समय मिला
तब  बच्चों ने अलग अपना घरौंदा बना डाला

ऐसे समय साथी भी साथ छोड़ चल बसा
निराशा छा गयी विक्षिप्त सा जीवन बना डाला

महीनों बीता दिए  खुद से समझोते  करते हुए
चाय से इश्क जता खुद को आशिक बना डाला

अब मैं हूँ मेरा इश्क है और मेरी तन्हाई है
मोबाइल ले हाथ में खुद से प्यार कर डाला
               
                       


Thursday, 6 October 2022

किताबें

 खामोश सी बंद दिखने वाली किताबें 

 खोलने पर बहुत ज्यादा बोलती हैं 

लिखने वाले के दिल में दफन 

अनछुए पहलुओं के 

बरसों से  अबोले राज खोलती हैं

इनकी भी अलग  दुनिया है अपनी

दिखाकर जादूगरी शब्दों की 

पढ़ने वाले की नब्ज टटोलती हैं

 गलतियां गलतफहमियां है क्या 

क्यूँ दरारें पड़ जाती हैं दिलों में 

 ये आँखो पर पड़े पट खोलती हैं

होंसला देती हैं  जागती आँखों को 

नित नए सपनों को साकार करने का 

रवानगी दे  खुला आसमान खोजती हैं 

कुछ ऐसे मीठे से शब्द परोसकर 

कानों में शहद सा मीठा रस  घोलती हैं 

बात से बात जुड़ जुड़ कर 

बन जाती एक कहानी है 

जो पढ़ने वाले के आसपास डोलती है 

खामोश सी बंद दिखने वाली किताबें 

 खोलने पर बहुत ज्यादा बोलती हैं

Thursday, 29 September 2022

इस जिंदगानी में

 दुख बहुत मिले  इस जिंदगानी में

देख इन गमों को बल पड़े पेशानी में


 कभी ढूँढनी चाही ही नहीं खुशियाँ

बस  हरदम घूमते   रहे परेशानी में


जिंदगी को लेकर बुने थे जो ख्वाब

बुलबुले की भांति बह गए पानी में


टूटा हुआ दिल लिए फिरते रहे यूँ ही

रो कर ही काट लिये दिन जवानी में


फिर एक दिन सोचा खुद के बारे में

आ गया उस दिन एक मोड़ कहानी में


जीने लगी अब एक नई सी दुनिया में

जिंदगी चलने लगी फिर से रवानी में


छोड़ सब गम खुद को दी  नई मुस्कान

छोड़ कर दिया खुद को हवा सुहानी में

 

अब समझ आया वो जिंदगी ही क्या

हंसते हंसते जो कट जाए आसानी में