Wednesday, 8 April 2026

गज़ल 34

 










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ये सूरज यूँ कुछ कुछ  बदलने लगा है 

तपिश से ही सहरा ये जलने लगा है 


बरस दर बरस साथ झेला बहुत दुख 

मुझे साथ अब क्यूं ये खलने लगा है 


कहानी बुढ़ापे के दिल की अलग है 

तुझे देख बच्चों सा खिलने लगा है 


जो शबनम जमी रह गई थी धरा पर 

वो मोती सा बन अब  पिघलने लगा है 


शहर लौट आएं हैं पंछी ये नीलम 

मेरा दिल खुशी से उछलने लगा है 

                


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