122 122 122 122
ये सूरज यूँ कुछ कुछ बदलने लगा है
तपिश से ही सहरा ये जलने लगा है
बरस दर बरस साथ झेला बहुत दुख
मुझे साथ अब क्यूं ये खलने लगा है
कहानी बुढ़ापे के दिल की अलग है
तुझे देख बच्चों सा खिलने लगा है
जो शबनम जमी रह गई थी धरा पर
वो मोती सा बन अब पिघलने लगा है
शहर लौट आएं हैं पंछी ये नीलम
मेरा दिल खुशी से उछलने लगा है

No comments:
Post a Comment