Thursday, 30 January 2025

6 गज़ल

 

          6 गज़ल
122        122         122      122 
खलल तो डला पर  निकलते रहे हल
    वफा करने वाले  बदलते रहे दल

दुखों का रहा घेरा मेरे ही घर पर
     तेरे साथ जीकर गुजरते रहे पल

शज़र काट डाले क्यों फलदार हमने
जुदा हो शज़र से बिखरते रहे फल

ढका बादलों ने ही सूरज को ऐसे
बड़ी धुंध थी सब ठिठुरते रहे कल
 
यूँ मातम दुखों का न कर अब तू नीलम
तू कर इश्क़ रब से   महकते रहें पल
                         
                            

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