नया साल
हर साल की तरह फिर नया साल आया
बैठे-बैठे कुछ नया करने का ख्याल आया
खुशकिस्मत समझूँगा मैं अपने आप को
गर एक भी चेहरे पर मुस्कान ला पाया
लेता रहा हूं बहुत कुछ समाज से हरदम
ढलती उम्र में समाज को देने का वक्त आया
छोड़ दो अतीत की, बीते साल की बातें
इस्तकबाल करो ये जो नया सवेरा लाया
जूझ रहे हैं जो गम दुख एकाकीपन से
बन उनकी हिम्मत बनना है उनका हमसाया
साथ खड़े होना सीख दुख में हर किसी के
पराया नहीं जैसे हो वह तेरा ही मां जाया
समझूंगा खुद का जीवन बेकार ही गया
गर नफरत जात-पात के बंधन ना तोड़ पाया
साहित्य से लोगों में देशप्रेम का जज्बा जगाया
नीलम ने साहित्यकार होने का फर्ज निभाया
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