6 गज़ल
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खलल तो डला पर निकलते रहे हल
वफा करने वाले बदलते रहे दल
दुखों का रहा घेरा मेरे ही घर पर
तेरे साथ जीकर गुजरते रहे पल
शज़र काट डाले क्यों फलदार हमने
जुदा हो शज़र से बिखरते रहे फल
ढका बादलों ने ही सूरज को ऐसे
बड़ी धुंध थी सब ठिठुरते रहे कल
यूँ मातम दुखों का न कर अब तू नीलम
तू कर इश्क़ रब से महकते रहें पल