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किसी से की कोई जलालत नहीं है
खुदा से बड़ी ये अदालत नही है
रखा कोई रिश्ता नहीं उन से जिनको
रही बोलने की लियाकत नहीं है
परिंदा हूँ कमज़ोर पर हैं ये मेरे
अभी उड़ने की मुझमें ताकत नहीं है
समय की नजाकत को समझो जरा सी
मुकरने की वादे से आदत नही है
गयी लौट चेहरे मेरे की वो रौनक
रही मुझमें अब वो नजाकत नहीं है
शिकायत रखी ही ना गैरों से नीलम
दी अपनों ने भी कोई राहत नही है
