Friday, 4 November 2022

कतरा कतरा

 


        कतरा कतरा

कतरा कतरा कटती रही

बूंद बूंद बहती रही

दुखों में बरफ सी जमती रही

खुशी में फूल सी खिलती रही

सुखों में धूप सी पिघलती रही

दिल में धड़कती रही 

रगों में खून सी बहती रही

कंकड़ सी  पांव में चुभती रही

पल पल भटकती रही

कभी उदासियों में घिरती रही

कभी कलियों सी महकती रही 

कभी चिड़िया सी चहकती रही 

किसी नशे सी झुमती रही 

अल्हड़ सबां सी बहकती रही 

नदीया की धार सी चलती रही 

रेत की मानिंद फिसलती रही

शोख रंग सी चटकती रही

धीमे धीमे सरकती रही

गमों में सुबकती रही

बचपन से जवानी तक

जवानी से बुढ़ापे तक

जिंदगी यूँ ही गुजरती रही

   नीलम नारंग



Friday, 28 October 2022

दोहरा वजूद

 


         दोहरा वजूद
दोहरे वजूद को जीती रही
हर बार अपने ही लब सीती रही
मुझे ललकारता मेरा ही मौन
अकसर प्रश्न उछालता मै कौन
हिरणी सी यहाँ वहाँ भागती रही
पता नहीं क्या तलाशती रही
उम्र गुजरती रही
बेचैनी बढ़ती रही
आखिर एक दिन छिड़ी मन से मन की जंग
जिसे सुन मै भी रह गई दंग
फिर खुद के लिए  बनाईं एक सीमा रेखा
कुछ भी हो जाए खुद को नहीं करना अनदेखा
मेरी भी अपनी एक जिंदगी है
करनी उसकी भी बन्दगी है
जीना है मुझे और आगे बढ़ना है
अपनी हस्तरेखा को खुद ही गढ़ना है
इस सोच से ही स्फूर्ति छा  गई
और जिंदगी मेरी मेरे करीब आ गई
     




Wednesday, 26 October 2022

जीने का बहाना

        जीने का बहाना


जाते हुए जीने का बहाना दे गया
दोस्त अपना  प्यारा पुराना दे गया

राज़दार  रहा था जो हम दोनों का
दोस्ती का  वो भरपूर खजाना दे गया

नहीं तो बहते ही रहते आँख से आँसू
लबों पर हँसी का ऐसा  बहाना दे गया

जात पात से ऊपर ही रखना दोस्ती को
लोगों को परखने का अलग पैमाना दे गया

वैसे ही किस्सों में  चल रही थी जिन्दगी
एक नई कहानी नया अफ़साना दे गया

बहुत  से अनमोल तोहफे दिए तुमने
दोस्ती के नाम पर ये कैसा नज़राना दे गया

भूलकर मुझे नई दुनिया बसा लि तुमने तो
जाते हुए मुझे रहने का ठिकाना दे गया 

Saturday, 22 October 2022

बादल

 


किसीकी याद को तरस रहे हैं

जो यूँ  ही बेतहाशा बरस रहे हैं


तेरे आने से मिले सुकून के लम्हे

तेरे बिन जाने कैसे झुलस रहे हैं


घुल जाती है कुछ कड़वाहट कभी

खुद को चाहे रखे कैसे सरस रहे हैं


महका रही है मिट्टी की सौधीं खुश्बू

इसके बिन तो जीवन नीरस रहे हैं


इस भीगे मौसम में आ जाओ साजन

अब तो लगता दुर्लभ तेरे दरस रहे हैं

          



Friday, 21 October 2022

ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ

 ਸਲਾਮ ਕਰ ਦੀ ਹਾਂ ਮੈ

ਪੰਜਾਬ ਦੀ ੳਸ ਮਾਂ ਭੈਣ ਤੇ ਧੀ ਨੂ
ਜਿਸ ਮਾਂ ਨੇ ਜਮਆ ਸੂਰਮਾ ਪੂਤ
ਜਿਨੂ ਘੋੜੀ ਚਢਾਣ ਦੇ ਖਾਬ ਦੇਖੇ
ਛੱਡ ਘੋੜੀ ਔ ਚਢ ਗਿਆ ਫ਼ਾਂਸੀ
ਨਾਲ ਕਸਮ ਦੇ ਗਿਆ ਹੰਝੂ ਨਾ ਵਹਾਇ
ਸ਼ਹੀਦ ਦੀ ਮਾਂ ਹੈ ਸਿਰ ਨੀਵਾਂ ਨਾ ਪਾਈ
ਸੌਚ ਰਹੀ ਮਾਂ ਨਿਮਾਨੀ
ਹੰਝੂ ਜਥਰ ਕਿਵੇਂ ਕਰਾ
ਮਾਂ ਤਾਂ ਮਾਂ ਹੁੰਦੀ ਹੈ
ਏ ਦੁਖੜਾ ਮਾਂ ਕਿਵੇਂ ਜਰੇ
ਦਸੇ ਤਾਂ ਕਿਨੂ ਕਿ ਕਹੇ
ਹੁਣ ਵੀ ਮਾਂਵਾਂ ਪੂਤ ਤਾਂ ਮੰਗਦਿਆਂ ਨੇ
ਡਗਤ ਸਿੰਘ ਸਰੀਖੇ
ਪਰ ਅਪਨੀ ਕੂਖ ਤੌ ਨਹੀਂ
ਦੂਜੇ ਦੀ ਕੂਖ ਤੌ ਜਮਾਈ
ਔ ਬੌਗੇ ਨੂੰ ਬੇਬੇ ਬਨਾ ਗਿਆ
ਆਵਦੇ ਜਨੀ ਭੇਦ ਸਾਰੇ ਮਿਟਾ ਗਿਆ
ਕਿ ਔਸ ਡੈਣ ਦੀ ਗੱਲ ਸੂਨਾਵਾਂ
ਰੱਖੜੀ ਦਾ ਮੂਲ ਚੱਕਾ ਗਿਆ
ਉਸਦੀ ਰਖਿਆ ਕਰਨ ਵਾਸਤੇ
ਲੜ ਬੈਠਾ ਕਿਨੇ  ਹੀ ਆਤਤਾਇਯਾਂ ਨਾਲ
ਸਲਾਹੁਦੀ ਨ੍ਹੀ ਥੱਕਦੀ ੳਸ ਧੀ ਨੂ
ਕਾਟਤੀ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ੳਦੇਂ ਨਾਮ ਤੇ
ਜਿਹਦੇ ਲਾੜ ਨਾਲ ਲਾਣ ਦਾ ਪਿਓ ਨੇ
ਕੀਤਾ ਸੀ ਵਿਚਾਰ ਕਦੇ
ਕਿਨਾ ਫਰਕ ਹੈ ੳਸ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਤੇ ਆਜ ਦਿ ਨੌਜਵਾਨ ਪੀੜੀ ਚ
ਆਜ ਦਾ ਨੌਜਵਾਨ ਜਿਨ੍ਹੇ ਅਪਣੇ ਆਪ ਨੂ
ਗੁਲਾਮ ਬਣਾ ਲਿਆ ਹੈ ਨਸ਼ੇਆ ਦਾ
ਕਿਵੇਂ ਸਮਝ ਸਕੇਗਾ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂ











Wednesday, 19 October 2022

असर ऐसा

 तेरी चाहतों का रहा कुछ असर ऐसा

तेज हवाएँ ढहा जाए कुछ कहर जैसा


साथ साथ समानांतर चलते रहे

 अब आ गया जिंदगी में सहर कैसा


 सिर्फ तुम्हें बनाया था राजदार अपना 

राज खोल दिया तो रहा हमसफ़र कैसा  


बच कर रह रही हूँ सबकी निगाहों से

घोल दिया मेरी जिंदगी में ये जहर कैसा


आग लगी झुलस गया तन मन सब 

जैसे जले बदन गरमी की दोपहर जैसा


मार के पत्थर खलबली सी मचा दी 

था कभी शांत खामोश सी नहर जैसा






Friday, 14 October 2022

मेरा घर

            मेरा घर


सारी उम्र की कमाई को खर्च कर डाला
पाई पाई जोड़कर  मोहताज कर डाला

खून पसीना बहाकर जोड़ा था जो पैसा
उससे उम्मीदों का महल खरा कर डाला

जगह जगह से इक्कठे किए  सुन्दर फूल
पेड़ पौधे लगा घास उगा बगीचा बना डाला

सोचा था मिलेंगे जब फुर्सत के कुछ क्षण
मस्ती के पलों के लिए जुगाड़ बना डाला

जब मिली फुर्सत और बैठने का समय मिला
तब  बच्चों ने अलग अपना घरौंदा बना डाला

ऐसे समय साथी भी साथ छोड़ चल बसा
निराशा छा गयी विक्षिप्त सा जीवन बना डाला

महीनों बीता दिए  खुद से समझोते  करते हुए
चाय से इश्क जता खुद को आशिक बना डाला

अब मैं हूँ मेरा इश्क है और मेरी तन्हाई है
मोबाइल ले हाथ में खुद से प्यार कर डाला