Monday, 29 August 2022

ਜਦੋਜਹਿਦ

 ਜਦੋਜਹਿਦ 


ਇਕ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਬੀਜ 

ਕਰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਜਹਿਦ 

ਮਿੱਟੀ ਚੋ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਣ ਦੀ

ਆਪਣੇ-ਆਪ ਨੁ ਪਲਵਿਤ ਕਰਨ ਲਈ 

ਕਾਰਦਾ ਹੈ ਸੰਘਰਸ਼ 

ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਵੀ ਤੇ ਮਿੱਟੀ ਨਾਲ ਵੀ 

ਹਵਾ ਪਾਣੀ ਤੇ ਪਕੂਤਿ ਨਾਲ ਵੀ

    ੲਵੇ ਹੀ ਹਰ  ਔਰਤ ਦਾ ਸੰਘਰਸ਼ ਵੀ 

ਚਲਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ੳਮਰਭਰ 

ਕਰਦੀ  ਰਂਹਦੀ ਹੈ ਔਹ ਵੀ ਜਦੋਜਹਿਦ 

ਹਰ ਵੇਲੇ ਅਪਣੇ ਆਪ ਨਾਲ ਵੀ

ਘਰ ਦੇ ਥਂਦੇਯਾ ਨਾਲ ਵੀ ਤੇ ਸਮਾਜ ਨਾਲ ਵੀ

ਤਾਂ ਹੀ ਪਾ ਸਕਦੀ ਹੈ ਆਪਣਾ ਵਜੂਦ 

ਤਾਂ ਹੀ ਮਿਲਦੇ ਨੇ ਓਸਨੂ 

ਅਪਣੇ ਸਪਨੇਯਾਂ ਦੇ ਖਾਮਥ

Friday, 26 August 2022

भुगतान

 भुगतान

बीती जिंदगी के भुगतान कर रहे हैं

जिंदगी पर बस अहसान कर रहे हैं


खूबसूरत मीत यार थे जो बचपन के

दे धोखा  खुद को अनजान कर रहे हैं


बन शातिर तमाशाई खड़े हैं  भीड़ में

लगा आज उससे नई पहचान कर रहे हैं

Wednesday, 24 August 2022

रुकना नहीं

 रुकना नहीं

चलते हुए  अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

       तलाश कर रही  थी

       जिस मंजिल की बरसों से

        आने वाली है बस वो

ठहर जरा पर थकना नहीं

चलते हुए अब  रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

                हैं रास्ते टेढ़े तो क्या

             थकने लगे हैं पांव तो क्या

              धूप की तपन है तो क्या

कुछ भी हो पीछे  हटना नहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

           राह में मिलेंगे खार भी

           तेज धूप रेत जैसे थार की

         मन में ना आने पाए हार की

मजबूत रख इरादे डटना वहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

               हरदम है एक नया संघर्ष

               मन में उठे नया जोश सहर्ष

             नहीं सोचना करम का निष्कर्ष

हालात कैसे भी हो टूटना नहीं

चलते हुए अब रुकना नहीं

झूकाए कोई तो झूकना नहीं

Friday, 19 August 2022

वाह

 बस एक  वाह क्या निकली उनके लिए

उम्र भर के लिए वो तो फिदा हो गया

चाहत अभी लत में बदलने ही लगी थी

हसीन सपने सा वो मुझसे जुदा हो गया

Monday, 15 August 2022

सावन

 


           सावन

हर सावन कुछ इस तरह आए
कोई मुस्कुराए कोई नीर बहाए

कोई  बैठ बगीचे  में पकौड़े खाए
कोई रोटी को भी तरसता जाए

बारिश की बूँद कहीं मन बहलाए
यही बूँद  किसी की छत टपकाए

किसी को सावन सब हरा दिखाए
कोई  रोज की रोटी रोजी से जाए

पानी में कागज की नाव बनाए
बच्चों को यह मयस्सर हो जाए

खुशियों भरे दिन यहाँ सब बिताएं
नीलम करे सबके लिए बस यही दुआएं
                 




Thursday, 11 August 2022

गुज़र बसर

 गुजर बसर

कुछ तेरा भी हुआ है मुझपर असर

ये चेहरे पर भी आने लगा है नजर


बंद कली थी अब खिल उठी फूल सी

मुरझाया चेहरा जैसे बन गया हो टसर


घर में तो तुम्हारे कभी   बस ना पाऊंगी 

नजरों में रहकर ही कर लेंगे  गुजर बसर 


बच कर रहना इस बेरहम दुनिया में

चाहतों पर लग ना जाए किसी की नजर


खून के आंसू रूला देतें है लोग बेवजह

बेआबरू करने में नहीं छोड़ते कोई कसर


हालात हावी हो जाते हैं  कभी कभी उनपर

   वक़्त रहते वक़्त की जो करते नहीं कदर 


करती रहना हौसला आगे बढ़ने का हरदम

पीछे हटने के लिए मत करना अगर मगर


खुद को साबित करने पकड़ ली राह नई

कठिनाई से भरी है नीलम ये नई डगर

Sunday, 7 August 2022

वज़ूद

 शीर्षक :   वजूद 


कुछ  सवाल घेरे रहते हैं मुझको

जब भी कोई पूछता  है

 मुझसे  ही वजूद मेरा

हैरत में पड़ जाती  हूँ 

जब परिचय देते हुए बोलती हूँ

सिर्फ  एक  ही शब्द 

इंसान सिर्फ इंसान 

और अगला प्रश्न उछलता  है 

धर्म जात गोत्र कौन सी 

किसकी बहु बेटी हो किसकी

हर बार उलझा जाता है  ये प्रश्न मुझे

कभी कभी क्रोधित हो उठती हूँ

और कभी हँसी में टाल जाती हूँ

व्यथित हो उठती हूँ अक्सर 

इस तरह के सवालों से 

जो आंकते हैं कमतर 

हर उस औरत को 

जो ढूँढ रही है राह नई

बनाना चाहती है अस्तित्व

अपनी एक पहचान नई

पूछती हूँ मै आप सबसे 

क्या  जायज  नहीं है मेरा व्यथित होना

इन सब बातों पर