Thursday, 13 March 2025

13 गज़ल

 

2122   121


  2  22
   
       13. गज़ल
आ लगा जा गुलाल होली में
कर दे रंगीन गाल  होली में

संग तेरे कभी ना रह पाई
बस यही है मलाल होली में 

मुश्किलों छोड़ दो दमन करना
  मरना    जीना मुहाल होली में

बन रही टोलियाँ युवाओं की
आ गया है उबाल होली में

प्यार के रंग में उसने रंग के मुझे
कर दिया है निहाल होली में
        
  

Friday, 7 March 2025

डर

 



         डर
कई बार मैं डर जाती हूं
जब बेटी को देखती हूं
खिलखिला कर हंसते हुए
कहकहे लगाते हुए
उसको स्पष्टता से बेबाकी से
अपनी बात कहते हुए
देर रात दोस्तों के साथ घूमते हुए
ठीक को ठीक गलत को गलत कहते हुए अपनी ठीक बात  पर कायम रहते हुए फिर सोचती हूं
मैं भी तो यही कुछ करना चाहती थी अपनी जवानी में
लेकिन मुझे डरा दिया गया
समाज के नाम से
रीति रिवाज के बंधनों से
मां-बाप की इज्जत के नाम पर
और मैं डर गई
समेट लिया मैंने अपने आप को
अब मैंने सोचा
बेटी को नहीं डराऊंगी
वह जो करना चाहेगी
मैं उसके साथ ही खड़ी नजर आऊंगी

Tuesday, 25 February 2025

10. गज़ल



 10. गज़ल


122  122    122    122    

                      


1.रुलाने से अच्छा खफा  छोड़ जाते
तसल्ली तो होती वफा छोड़ जाते


2. तुझे देखती दूर तक अलविदा कह
मुड़े जो गली से हया छोड़ जाते


3. हमेशा मुझी से शिकायत की तुमने
    जुदाई से पहले खुशी छोड़ जाते


4.ये दीपावली रोशनी का है उत्सव
खुशी के लिए एक दिया छोड़ जाते


5.पुराने जमाने से अच्छा समा है
कहानी में फिर कुछ नया छोड़ जाते


6. किया इश्क़ चाहा दिलोजान से यूँ
निभाते नहीं तो जहाँ छोड़ जाते

Sunday, 16 February 2025

9 गज़ल

           गज़ल


माना मिले थे हम कभी अनजान की तरह
तुमको करुं यूं याद मैं भगवान की तरह


लिखना तो चाहते हैं गरीबों पे लोग सब
माना नही विचारते इंसान की तरह


ना चाहते हुए भी    भरोसा रहा मेरा
जैसे मिली उसे फिर वरदान की तरह


आंसू बता रहे हैं कहानी ये रात की
बीती है जिन्दगी तेरी अहसान की तरह


मंशा नही थी  दुख यूं जताने की मेरी भी
चाहा है उस को मैंने  दिलोजान की तरह


वादे पे जिसके मैंने भरोसा किया है अब
धोखा मिला उसी से है शैतान की तरह

Tuesday, 11 February 2025

8 गज़ल


 122     122     122    122

 किसी से  की कोई जलालत नहीं है 

खुदा से बड़ी  ये अदालत नही है


रखा कोई रिश्ता नहीं उन से जिनको

रही बोलने की लियाकत नहीं है 


परिंदा हूँ  कमज़ोर पर हैं  ये मेरे

  अभी उड़ने  की मुझमें ताकत नहीं है


समय की नजाकत को समझो जरा सी

मुकरने की वादे से आदत नही है


 गयी  लौट चेहरे मेरे की वो रौनक

 रही मुझमें अब वो नजाकत नहीं है


 शिकायत रखी ही ना  गैरों से नीलम

दी अपनों ने भी कोई  राहत  नही है

Wednesday, 5 February 2025

7. गज़ल

 


1222     1222          1222   1222

जियेंगे साथ हम दोनों अभी तो जज्बात  बाकी है।
करें हम मन की  बातें कुछ अभी तो रात बाकी है ।।
 दिए जो वक़्त ने जख्म उनसे झुक  गया हूँ 
मिली है जिंदगी से शह अभी ये मात बाकी है।।

 
 दिखाएं हैं तुझे दिलकश नजारे  जो मुहब्बत में।
इतर उनसे  सहन करना अभी ये घात बाकी है।।
लुटाना  चाहता था इश्क़ में सब कुछ तुम्हें अपना। 

मैं डरता हूँ बतानी जो अभी ये जात बाकी है।।

 
खड़े हैं संत दरवाजे पे रख उम्मीद खाने की।
खिलाऊं किस तरह उनको  बनाना जो अभी ये भात बाकी है।।

 
नवाजिश रुख है दरकार पानी की उसे नीलम
बचा ले सूखने से उसे  अभी तो पात बाकी है


Thursday, 30 January 2025

6 गज़ल

 

          6 गज़ल
122        122         122      122 
खलल तो डला पर  निकलते रहे हल
    वफा करने वाले  बदलते रहे दल

दुखों का रहा घेरा मेरे ही घर पर
     तेरे साथ जीकर गुजरते रहे पल

शज़र काट डाले क्यों फलदार हमने
जुदा हो शज़र से बिखरते रहे फल

ढका बादलों ने ही सूरज को ऐसे
बड़ी धुंध थी सब ठिठुरते रहे कल
 
यूँ मातम दुखों का न कर अब तू नीलम
तू कर इश्क़ रब से   महकते रहें पल