Friday, 7 March 2025

डर

 



         डर
कई बार मैं डर जाती हूं
जब बेटी को देखती हूं
खिलखिला कर हंसते हुए
कहकहे लगाते हुए
उसको स्पष्टता से बेबाकी से
अपनी बात कहते हुए
देर रात दोस्तों के साथ घूमते हुए
ठीक को ठीक गलत को गलत कहते हुए अपनी ठीक बात  पर कायम रहते हुए फिर सोचती हूं
मैं भी तो यही कुछ करना चाहती थी अपनी जवानी में
लेकिन मुझे डरा दिया गया
समाज के नाम से
रीति रिवाज के बंधनों से
मां-बाप की इज्जत के नाम पर
और मैं डर गई
समेट लिया मैंने अपने आप को
अब मैंने सोचा
बेटी को नहीं डराऊंगी
वह जो करना चाहेगी
मैं उसके साथ ही खड़ी नजर आऊंगी

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