गज़ल
माना मिले थे हम कभी अनजान की तरह
तुमको करुं यूं याद मैं भगवान की तरह
लिखना तो चाहते हैं गरीबों पे लोग सब
माना नही विचारते इंसान की तरह
ना चाहते हुए भी भरोसा रहा मेरा
जैसे मिली उसे फिर वरदान की तरह
आंसू बता रहे हैं कहानी ये रात की
बीती है जिन्दगी तेरी अहसान की तरह
मंशा नही थी दुख यूं जताने की मेरी भी
चाहा है उस को मैंने दिलोजान की तरह
वादे पे जिसके मैंने भरोसा किया है अब
धोखा मिला उसी से है शैतान की तरह

