मेरी खिड़की से सब दिखता है
चांद तारे हवा सूरज
नहीं दिखते तो बस आते जाते लोग
आपस में बतियाते हंसते हुए
नन्हें बच्चों किलकारियां मारते हुए
बिस्तर पर पड़े पड़े जो दिखता है
उसको महसूस करती हूं
और जो नहीं दिखता
उसकी कल्पना करके
खुद को खुश कर लेती हूँ
मेरी खिड़की से सब दिखता है
चांद तारे हवा सूरज
नहीं दिखते तो बस आते जाते लोग
आपस में बतियाते हंसते हुए
नन्हें बच्चों किलकारियां मारते हुए
बिस्तर पर पड़े पड़े जो दिखता है
उसको महसूस करती हूं
और जो नहीं दिखता
उसकी कल्पना करके
खुद को खुश कर लेती हूँ
अमलतास
जेठ की तपती दुपहरी में
सड़क के किनारे चलते हुए
देख कर अमलतास के फूलों को
गर्मी से कुम्लाहे चेहरे पर भी
आ जाती है हल्की सी मुस्कान
खिल उठता है मन भी
तेरे सुनहरी फूलों की तरह
मन की मुस्कान के साथ-साथ
उतर जाती है तन की थकावट भी
खड़े रहो ऐसे ही इस्तकबाल करते हुए
ਕਲਿਆਂ ਬੈਠਕੇ ਚਾਹ ਪੀਤੀ ਤਾਂ ਕੀ ਪੀਤੀ
ਆਵਦੇ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਕੀ ਕੀਤੀ
ਚਾਹ ਪੀਣ ਦਾ ਸਵਾਦ ਤਾਂ ਹੈ ਦੋਸਤਾਂ ਨਾਲ
ਕੁਝ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਸੁਨੀ ਤੇ ਆਵਦੀ ਕੀਤੀ
साहिल के किनारे बैठ
हवा संग आती जाती
लहरों को ताकना
नहीं है मकसद मेरा
मैं पीड़ा जानना चाहती हूं
उन पत्थरों की भी जो टूटते रहते हैं
छोटे-छोटे टुकड़ों में
बनते रहते हैं हिस्सा
अविरल बहते समुद्र का
अपनी पहचान गवा कर
चांद के आकार की तरह
घटती बढ़ती इच्छाएं
कभी पूर्णमासी के चांद सी
परिपूर्ण
कभी अमावस के
चांद सी निल
कभी ढेर सारी
और कभी एक आध
जिंदगी के साथ
कदमताल करती हुई
मेरे गाम का के हाल तू बुझै सै रै भाई
ऐकले पड़ रहे है इते सारे लोग लुगाई
अनपढ़ करे सै मजूरी सहर मै जाके
पढ़े लिखे नै तो ब्याज मै जमीन गवाई
पुरखिया की जमीन बंट गई आपस में
जिसके खातर करै कचहरी और लड़ाई
बीतै भर का खेत आ गया सबकै हिस्से में
कित बोवैं फसल अर किस की करै कटाई
गुजारे लायक भी फसल जद ना देंवे खेत
के करै शहर में जाकर ना करै गर कमाई
ਮੇਰੀ ਹੋਂਦ ਤੇ ਸਵਾਲ ਖੜੇ ਕੀਤੇ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ
ਮੇਰਾ ਜੀਵਨ ਮੂਹਾਲ ਕੀਤਾ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ
ਲੜ ਤੇਰੇ ਲੱਗ ਛੱਡ ਦਿੱਤੀ ਦੇਹਰੀ ਪੇਕਿਆਂ ਦੀ
ਪਰ ਸ਼ਕ ਦੇ ਘੇਰੇ 'ਚ ਰਹੀ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ
ਹਮਸਫ਼ਰ ਬੰਨ੍ਹ ਟੁਰਦੀ ਰਹੀ ਨਾਲ ਤੇਰੇ ਹਰ ਪਲ
ਜਿਉਣਾ ਛੱਡ ਜਿਊਦੀਂ ਰਹੀ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ
ਹੂਣ ਜਦੋਂ ਸੋਚ ਲਿਆ ਤੇਰੇ ਤੋਂ ਵੱਖ ਹੋਕੇ ਜਿਉਣ ਦਾ
ਗੱਲਾ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪਏ ਲੋਕ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ
ਇਕ ਨਵਾਂ ਮੁਕਾਮ ਤਾਂ ਹਾਸਲ ਕਰ ਹੀ ਲਉਂਗੀ
ਛੱਡ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਹੋਨਾ ਨੀਲਮ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ ਕਦੇ ਕਿਵੇਂ