साहिल के किनारे बैठ हवा संग आती जाती लहरों को ताकना नहीं है मकसद मेरा मैं पीड़ा जानना चाहती हूं उन पत्थरों की भी जो टूटते रहते हैं छोटे-छोटे टुकड़ों में बनते रहते हैं हिस्सा अविरल बहते समुद्र का अपनी पहचान गवा कर
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