Wednesday, 1 September 2021

ईन दिनों

 जाने क्यूँ बहुत याद आने लगे हो इन दिनों

देखे थे ख्वाब साथ जो पुरे हो रहे इन दिनों

मसला मेरा स्वाभिमान से जीने का था बस
दिल को कचोट रहे है कुछ सवाल इन दिनों

तेरे जाने से छूट गए थे जो रंग जीवन में
फिर से  बस वही रंग भाने लगे है इन दिनों

छोड़कर मुस्कुराना सीख लिया था जीना
तुझ बिन भी महफिल भा रही है इन दिनों































Saturday, 21 August 2021

माँ बाप का घर

 ज्यादातर लड़कियों को घर में हिस्सेदार नही माना जाता । इसी विषय पर है मेरी कविता जिसका शीर्षक है  माँ बाप का घर लड़की अपने भाई से पूछ रही है

               माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
जिस घर में जन्मी मै
उस घर में जन्मे तुम
एक साथ पले बढे
एक साथ लड़े हम
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
        तुम खेले सड़कों पर
         मैनें घर को बुहारा
        माँ के बीमार होने पर
         रोटी के लिए मुझे पुकारा
                   फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
घर बनाने के लिए पत्थर ढोया
पानी के लिए नल मैनें चलाया
दुख सुख को एक साथ बिताया
अच्छा बुरा सब एक साथ निभाया
                     फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ
कुछ  पैसे देकर तुझे आगे पढाया
मुझसे  माँ ने घर का काम कराया
आज तुझसे ज्यादा डिग्री पास मेरे
दुख में खुशी का अहसास कराया
                    फिर माँ बाप का घर अकेले तेरा कैसे हुआ

Thursday, 29 July 2021

बिन मेरे

            बिन मेरे

जब वो मेरे शहर में आए होगें
शाम के धुँधलके तब छाए होगें

डाल हाथों में हाथ घुमे  थे कभी
सुहाने मंजर तो वो याद आए होगें

हुक सी तो उठी ही होगी सीने में
जब बादल आसमाँ में छाए होगें

ढूँढ रहे होगें शहर की गलियों में
हर कहीं अक्स मेरे नजर आए होगें

मुहब्बत में ये कैसी बेबसी होती है
दिल की बात को ना बता पाए होगें

हँस हँसकर बातें की होगी सबसे
कैसे नम आँख के कोर छुपाए होंगे

बैठे होगें महफिल में साथ सबके
उनमें भी  आए नजर मेरे साए होगें

करवटें बदली होंगी रात  बिस्तर पर
क्या जख्म किसी को दिखाए होगें

अपने दर्द को दिल में ही दबाए होगें
नीलम जब वो मेरे शहर में आए होगें
          





Sunday, 18 July 2021

बिछड़ कर

               बिछड़ कर

उसके जाने के बाद पैगाम आने लगे
कयूँ यादों के साथ सलाम आने लगे

बिखर गए थे जो मोती कभी टूटकर
वो माला बनाने के काम आने लगे

छोड़ आए थे जिन्हें  किसी मोड़ पर
जुबां पर उनके ही नाम आने लगे

खुश हुए थे कभी जिनकी वजह से
याद वो किस्से पुराने तमाम आने लगे

रूक गई थी जो जिन्दगी किसी के लिए
रूकी सी जिन्दगी में नए मुकाम आने लगे

बीता दी उम्र जिसको तन्हाई में याद करके
उसके जाने पर इश्क के इल्जाम आने लगे

चाहा था  कभी जिसे दिल की गहराई से
गए तो पीर फकीर याद सब धाम आने लगे

कट रही है जिन्दगी पुरानी यादों के सहारे
नीलम बिछड़ कर जीने केअंजाम आने लगे




























Thursday, 8 July 2021

मजबूर हो गए

             मजबूर हो गए


तुझ से दूर होकर खुद से ही दूर हो गए
कयूँ अपनी चाहतों से ही मजबूर हो गए

ना तुझे बेवफा कह सके ना खुद को
वक्त के ढाए सितम से ही चूर हो गए

हर दम ही रहते थे जो नजरों के सामने
वो किसी ओर की आँख का नूर हो गए

बंद कमरे में हुई थी फक्त चंद मुलाकातें
जमाने में जाने कैसे किस्से मशहूर हो गए

नीलम तो आज भी सलामती चाहती है
क्या हुआ गर आज तुम मगरूर हो गए












Friday, 25 June 2021

नमी सी है

 होठों पर मुस्कान आँख में नमी सी है

सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी सी है
अनजान राह पर बनाने थे निशान
मंज़िल पाकर भी खिसकी जमीं सी है 

Sunday, 20 June 2021

पिता

 पितृदिवस पर विशेष


बचपन में
पिता का साया सिर से उठने से
ऐसा लगता है घर की
चारों दिवारों का ढह जाना
और छत में कई छेद हो जाना
उन छेदों को भरते भरते
निकल जाती है उम्र
फिर भी
एक शिकवा सा एक कसक सी
एक सूनापन सा
कभी ना भरने वाला खालीपन
तमाम उम्र पसरा ही रह जाता है
खुशियों के मौके पर भी
कभी मुस्कुराते हुए भी
अनचाहे अनजाने में भी
हो ही जाती है आँख नम