Tuesday, 15 June 2021

कोई तहखाना है

 


कोई तहखाना है

आए है खाली हाथ खाली हाथ जाना है
ना कफन की जेब ना कोई तहखाना है

फिर भी लूटने पर लगा दौलत दूसरों की
नहीं देना उनको जिन्हें पसीना बहाना है

बदकिस्मती साथ रहती है कुछ लोगों के
मेहनत पर भी  नहीं मिलता मेहनताना है

जी चुराते रहते है जो लोग काम से हमेशा
ना कोई रहम है उनपर ना तरस खाना है

जोड़ते है पाई पाई बच्चों को देने के लिए
खुद भूखे रहने की परम्परा को ढहाना है

खून चूस गरीबों का खड़े कर लेते है महल
किसलिए और क्या जमाने को दिखाना है

नहीं रह गई  है कीमत ईमानदारी की जग में
झूठ कहते है सब बेईमान का ही जमाना है

झूठी दौलत नहीं बस खुशियों की आस रखो
एक दूसरे की मदद की आदत को अपनाना है

छोड़ दो मोह दौलत का रास्ते भ्रष्टाचार के
ये ऐसी दौलत है जिसने सब गलत कराना है

ला सके तो लाओ मुस्कुराहट किसी के चेहरे पर
नीलम जग में आए है तो बस प्यार निभाना है










Monday, 7 June 2021

एक नया ख्याल

          एक नया ख्याल

एक कैंटीन पर कुछ पुरुष बैठे थे
जब किसी बात पर ठहाका लगाया
सुन उनकी बिंदास बातों ने
मेरा भी कुछ कुछ माथा ठनकाया
बैठे बैठे यूँ ही फिर एक ख्याल आया
और उस ख्याल पर जब गौर फरमाया
फिर मैनें भी एक कहकहा लगाया
खुश होकर ख्याल सहेलियों को सुनाया
सुन मेरी बात उन्होंने मुझे गले लगाया
मैनें भी अपने समय से थोड़ा समय चुराया
मनपसंद जगह पर एक ढाबा खुलवाया
उसे मनपसंद सुन्दर से रंगों से सजाया
ओनली फार लेडीज का बोर्ड लटकाया
इसमें आकर बैठना मनपसंद बातें करना
अपना भी हक है ये लेडिज  को समझाया
आओ जो तन्हा है मेरी ही तरह
या घर बैठे जिनका है मन उकताया
परेशान हो गई है घर की समस्याओं से
इस जगह को मायका समझने के लिए उकसाया
बात करो बीते बचपन की रीती जवानी की
बेरूखी पति की या जिसके प्यार ने तुम्हें रिझाया
सांझे करो दुख सुख खुशनुमा बातें जिन्दगी की
उन भाई बहनों  की जिनसे दिल से प्यार है पाया
नहीं मिलेगा यहाँ धोखा ना ही ताना देने वाला
नहीं मिलेंगे वो बाबा जिन्होनें झूठा स्वांग रचाया
आ जाओ हमें भी हक है खुश रहने का
आशीर्वाद दें हमें बड़ों ने यही समझाया
मेरा अनोखा प्रस्ताव सुन दिया समर्थन
मन ही मन मेरी सहेलियों का चित हरषाया
शंका है फलीभूत होगा या नहीं
पर नीलम के ख्याल पर सबका मन भरमाया



Monday, 24 May 2021

लाचार रहा होगा

              लाचार रहा होगा


ना हिन्दु ना मुसलमान रहा होगा
कितना अपमानित लाचार रहा होगा

बहाई होगी लाश जब गंगा में यूँ ही
याद तो हर रस्म दाह संस्कार रहा होगा

सोचा होगा दो गज जमीन के लिए
पास ना कोई दोस्त मददगार रहा होगा

कहाँ से इंतजाम करता लकड़ियों का
पास में पैसा ना रिश्तेदार रहा होगा

सब कुछ हो जाने के बाद बहाए दो आँसू
अपनी नाकामी पर छीछालेदर रहा होगा

कैसे लोग भूल पाएँगे पीड़ा दुख अपनो का
नीलम समझ खुद को खाकसार रहा होगा



















Tuesday, 11 May 2021

बेवफा

               बेवफा

जब  भी दोस्त मिला बेवफा मिला
प्यार की जगह धोखा हर दफा मिला

जब भी चाहतों का जिक्र करना चाहा
कोरी किताब सा खाली हर सफा मिला

सुनाने जो निकले मन की बातें दूसरों को
सुनकर दास्तान हर शख्स ही खफा मिला
     
बाजार बना  दाम लगा लेते है रिश्तों का      
सोचते है कितना नुकसान या नफा मिला       

कयूँ गायब है मुस्कान हर इक के चेहरे से     
जिससे भी पूछा वह खुद  से कफा मिला   

गैरों की बात को तो जाने ही दो जानिब
जब भी मिला बस अपनों से ही जफा मिला

निकल पड़ा करो कभी ढ़ूढने पुराने दिनों को
यही वो जगह है जहाँ दोस्तों से शिफा मिला          

होते है कुछ खुशनसीब  लोग दुनिया में ऐसे
नीलम जिनको  वफा के बदले वफा मिला
              कफा __ पीड़ित
              जफा ___ अत्याचार
              



             

Thursday, 6 May 2021

सुखे गुलाब

     सुखे गुलाब


साठ साल पार के
लोगों की किताबें
जब भी खंगाली जाएंगी
हर किताब में एक नई कहानी 
दोहराई जाएगी                                                                                
हर किताब से मिलेंगे कुछ सुखे फूल
कुछ पन्ने मिलेंगे कोनों से मुड़े हुए
शायरी के अंदाज में लिखे कुछ शब्द
जिन्हें देख  उनके चेहरे  खिल जाएँगे
हर  फूल की अपनी दास्तान होगी
कुछ फूल तोड़े होंगे डाली से
माशूका को देने के लिए
अकेले वो मिली नहीं होगी
सामने देने की हिम्मत नहीं होगी
वो वापिस अपनी ही किताब में सहेजे होंगे
कुछ फूल माशूका तक पहुँचे होंगे
पर वो यादों तक ही सीमित होंगे
फूल रखा होगा किताब में
याद में चुपके से आँसू बहाए होंगे
किसी को याद में किताब के पन्नों को
बार बार बेतहाशा मोड़ा होगा
प्यार के इजहार के कुछ शब्द
लिखे होगें पन्नों पर
ना मिल पाने की मजबूरी भी
सिमट कर रह गई होगी शब्दों तक
कुछ शायर बन गए होगें
कुछ रह गए होंगे दीवाने बनकर
         







Saturday, 24 April 2021

कहते कहते रह गए

 कहते कहते रह गए


बहुत कुछ कहते कहते रह गए
मेरे कुछ सपने हवा संग बह गए

जमी हुई थी बर्फ जो रिश्तों में
अनजान बन खामोशी से सह गए

कर रखा था कैद खुद को घर में
बेवजह यादों में ही खोए रह गए

सुनी आहट दिल ने तेरे आने की
लगा सब दर्रे दिवार ही ढह गए

बना लो अपना रहनुमा कोई ओर
किस सुकून से बड़ी बात कह गए

बरसों किया इंतजार जिस आहट का
आकर बता मजबूरियों की वजह गए

छोड़ बीच मझधार में जा रहे हो कहाँ
किसी के सहारे रहने को कयूँ कह गए

कया हुआ सुन दास्तान चाहत की मेरी
कयूँ अश्क तेरे भी बहते बहते रह गए

रजा और सजा जो चाहे मान लो
डाल असमंजस में नीलम को वह गए




Wednesday, 14 April 2021

खुशी के क्षण

 गूथंते हुए आटा

गूथं लेती हूँ
शब्दों को कविता के रूप में
कभी बुहारते हुए घर को
गंद के साथ साथ
नकारात्मक विचारों को भी
फेंक देती हूँ
बुनते हुए स्वेटर
फंदों के साथ साथ
बुन लेती हूँ कुछ ख्वाब
अपने लिए भी
काटते हुए सब्जियाँ
काट लेती हूँ
पाँव में पड़ी बेड़ियों को
सिलाई करते हुए
सिल लेती हूँ
वक्त के दिए जख्मों को
सच तो ये है
चुरा लेती हूँ खुशी के कुछ क्षण
कभी भी कहीं से भी